ग्वालियर |
कक्षा दसवीं के बाद नौकरी की तलाश में वर्षों तक भटकने वाली अंगूरी बाई बघेल आज आत्मनिर्भर किसान के रूप में मिसाल बन चुकी हैं। आत्मा परियोजना के अंतर्गत संचालित किसान पाठशाला में मिली खेती की आधुनिक शिक्षा ने उनके जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल दी। आज अंगूरी बाई खेती, बागवानी, मुर्गी पालन और मछली पालन के माध्यम से हर वर्ष लाखों रुपये की आमदनी अर्जित कर रही हैं।
विकासखण्ड भितरवार के भरथरी गांव की निवासी अंगूरी बाई बताती हैं कि दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने नौकरी के लिए तीन से चार वर्षों तक प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसी दौरान गांव में आत्मा परियोजना के तहत किसान पाठशाला का आयोजन हुआ। शुरुआत में समय बिताने के उद्देश्य से पहुंचीं अंगूरी बाई ने वहां दो दिवसीय प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसने उनकी सोच और भविष्य दोनों बदल दिए।
खेती से मिली सफलता, बढ़ता गया आत्मविश्वास
प्रशिक्षण के बाद अंगूरी बाई ने अपनी एक एकड़ भूमि में धान की खेती की, जिससे उन्हें अच्छा लाभ मिला। इसके बाद अगले वर्ष उन्होंने एसडब्ल्यूआई पद्धति से गेहूं की खेती अपनाई। इस आधुनिक तकनीक से उन्हें परंपरागत विधि की तुलना में कहीं अधिक उत्पादन प्राप्त हुआ।
आत्मा परियोजना के अधिकारियों के मार्गदर्शन में अंगूरी बाई को उद्यान विभाग से जोड़ा गया। इसके बाद उन्होंने दो बीघा में अमरूद का बगीचा विकसित किया। वर्ष 2022 में अमरूद से लगभग 60 हजार रुपये, जबकि 2023 में करीब 70 हजार रुपये की आय हुई।
इसके साथ ही उन्होंने एक बीघा में नींबू, 70 पौधे आंवला, आधा बीघा में थाई बेर और आधा बीघा में सिंघाड़े की खेती शुरू की, जिससे उनकी आय में लगातार वृद्धि होती गई।
मछली और मुर्गी पालन से मासिक आय में जबरदस्त उछाल
खेती और बागवानी के साथ-साथ अंगूरी बाई ने अपने खेत में बने तालाब में मछली पालन तथा मुर्गी पालन भी प्रारंभ किया। इन गतिविधियों से उन्हें नियमित और बेहतर आमदनी मिलने लगी। वर्तमान में उनकी मासिक आय लगभग 1.50 लाख रुपये तक पहुंच रही है, जो ग्रामीण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का सशक्त उदाहरण है।
प्रेरणा बनीं अंगूरी बाई
अंगूरी बाई बघेल की सफलता यह साबित करती है कि सरकारी योजनाओं का सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण यदि जमीनी स्तर पर मिले, तो ग्रामीण महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनकर न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन सकती हैं।
— मधु सोलापुरकर
उप संचालक, ग्वालियर
