बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर बढ़ता कहर: एक भयावह वास्तविकता
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पड़ोसी बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की स्थिति आज भयावह से भी आगे बढ़ चुकी है। हत्या, आगजनी, भीड़ हिंसा और झूठे “धर्म अपमान” के आरोप अब सिर्फ विशेष घटनाओं तक सीमित नहीं रहे हैं, ये एक स्थायी और व्यवस्थित समस्या बन चुकी है। पिछले पंद्रह दिनों में ही तीसरी बार किसी हिंदू युवक की हत्या ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वहाँ कानून की पकड़ टूट चुकी है और इस्लामिक कट्टरता को खुलेआम जगह मिल रही है। मयमनसिंह, ढाका और पिरोजपुर तक फैली हिंसा अलग-अलग घटनाओं का संग्रह भर नहीं है, यह तो सामूहिक सामाजिक विफलता की अभूतपूर्व तस्वीर है जो आज बांग्लादेश में हमें दिखाई देती है।
कहना होगा कि मयमनसिंह जिले में 29 दिसंबर 2025 की शाम बजेंद्र बिस्वास की गोली मारकर हत्या ने फिर सवाल खड़े कर दिए कि सुरक्षा व्यवस्था किनके लिए है और किनके लिए नहीं। पुलिस इसे केवल “दुर्घटना” मानने की कोशिश कर रही है, किंतु जिस सामाजिक और राजनीतिक माहौल में यह हुआ, वह इसे सामान्य घटना नहीं रहने देता। इसी जिले में 18 दिसंबर को दीपु चंद्र दास को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला और उसका शव सार्वजनिक रूप से जलाया, जोकि मानवता को शर्मसार कर देने वाली हिंसा थी।
बांग्लादेश को लेकर बीते कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या यहां अचानक उत्पन्न नहीं हुई है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 2022 में 47 हमले दर्ज किए गए, 2023 में यह बढ़कर 302 हो गए और 2024 में यह संख्या 3,200 पार कर गई। इसी अवधि में 23 हिंदुओं की मौत और 152 मंदिरों पर हमले भी दर्ज हुए। मानवाधिकार संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि 2023 से 2024 के बीच 1,045 से अधिक हमले हुए, जिनमें हत्या, जबरन भूमि कब्जा, घर और व्यवसाय तोड़ना, बलात्कार और जबरन धर्म परिवर्तन (इस्लाम अपनाने) जैसी घृणित घटनाएँ शामिल हैं।
समझनेवाली बात यह भी है कि हिंसा अपराध होने तक सीमित नहीं है, ये जनसांख्यिकीय संकट का संकेत भी है। 1974 में बांग्लादेश की कुल आबादी में हिंदू समुदाय 13.5 प्रतिशत था, जबकि मुसलिम आबादी 85.4 प्रतिशत थी। 2022 की जनगणना में हिंदुओं का हिस्सा घटकर केवल 7.96 प्रतिशत रह गया। यह स्पष्ट संकेत है कि सामाजिक-दबाव, हिंसा और विस्थापन के कारण यहां हिन्दू अल्पसंख्यक समुदाय लगातार सिकुड़ रहा है।
धर्म के अपमान या ‘ईशनिंदा’ के झूठे आरोप भी तेजी से बढ़े हैं। 2025 की जून से दिसंबर अवधि में कम से कम 71 ऐसे मामले दर्ज किए गए। यह दिखाता है कि सोशल मीडिया और अफवाहें समुदायों को भड़काने का माध्यम बन गई हैं और फिर भीड़ हिंसा को बढ़ावा दिया जाता है।
राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता इस संकट को और गंभीर बनाती है। बांग्लादेश ने खुद को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में पेश करने की कोशिश करता है लेकिन उसका व्यवहार इससे उलट है। राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथी ताकतों का उभार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें और वीडियो निर्दोष लोगों के जलते घर और पीड़ितों की तस्वीर यहां जीते-जागते सामूहिक असहिष्णुता का दस्तावेज हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समुदाय के लिए भी यह एक गंभीर चेतावनी है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के अनुसार हर राज्य की जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। जब एक धर्मनिरपेक्ष देश अपनी अल्पसंख्यक आबादी की सुरक्षा में असफल होता है तो यह संरचनात्मक मानवाधिकार संकट बन जाता है। भारत सहित कई देशों ने अपनी चिंता व्यक्त की है, लेकिन कूटनीतिक बयान और चेतावनी अब तक बांग्लादेश के संदर्भ में पर्याप्त नहीं है। समस्या को रोकने के लिए कट्टरपंथी समूहों पर कठोर कार्रवाई, दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी प्रावधान और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आज बेहद अनिवार्य है।
