यह चिंता केवल आईटी सेक्टर तक सीमित नहीं है। बैंकिंग मीडिया, हेल्थकेयर, शिक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और यहां तक कि सरकारी दफ्तरों में भी AI की एंट्री हो चुकी है। ऐसे में लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक है लेकिन इस पूरे विषय को सिर्फ डर के नजरिए से देखना अधूरा और एकतरफा विश्लेषण होगा।AI से नौकरी जाने का डर नया नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब-जब नई तकनीक आई है तब-तब रोजगार को लेकर आशंकाएं पैदा हुई हैं। औद्योगिक क्रांति के दौर में मशीनों के खिलाफ आंदोलन हुए थे। कंप्यूटर के आने पर भी कहा गया था कि क्लर्क और अकाउंटेंट जैसे पेशे खत्म हो जाएंगे। लेकिन समय के साथ काम के स्वरूप बदले नौकरियां खत्म नहीं हुईं।
आज AI उसी डर का आधुनिक रूप है। डेटा एंट्री कस्टमर सपोर्ट बेसिक अकाउंटिंग, ट्रांसलेशन और कंटेंट मॉडरेशन जैसे कई रिपीटेटिव काम पहले ही ऑटोमेशन की चपेट में आ चुके हैं। कंपनियां लागत घटाने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए AI टूल्स तेजी से अपना रही हैं। इसका असर खासतौर पर मिड-लेवल और दोहराव वाले कामों पर दिख रहा है। भारत जैसे देश में जहां आबादी अधिक और रोजगार के अवसर सीमित हैं यह चिंता और भी गहरी हो जाती है।हालांकि सच्चाई यह है कि AI कुछ नौकरियां जरूर खत्म करेगा लेकिन पूरी तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। AI काम को पूरी तरह खत्म नहीं करता बल्कि काम की प्रकृति को बदल देता है। उदाहरण के तौर पर बैंकिंग सेक्टर में AI ने कैश काउंटर का दबाव कम किया, लेकिन इसके साथ ही डेटा एनालिस्ट, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट और डिजिटल प्रोडक्ट मैनेजर जैसी नई भूमिकाएं भी सामने आईं। मीडिया में AI खबरों का ड्राफ्ट तैयार कर सकता है लेकिन जमीनी रिपोर्टिंग, जांच, संपादन और संपादकीय विवेक की जगह नहीं ले सकता।
विश्व आर्थिक मंच WEF की रिपोर्ट्स भी यही संकेत देती हैं कि AI और ऑटोमेशन कुछ नौकरियां खत्म करेंगे, लेकिन उससे अधिक नई नौकरियां पैदा भी करेंगे-बशर्ते लोग समय रहते अपनी स्किल्स को अपडेट करें।असल चुनौती बेरोजगारी नहीं, बल्कि स्किल गैप है। आज केवल डिग्री काफी नहीं रह गई है। डेटा को समझने की क्षमता, टेक्नोलॉजी के साथ काम करने का कौशल, क्रिएटिव थिंकिंग, समस्या समाधान और मानवीय संवेदनाएं-ये वे क्षमताएं हैं, जिन्हें AI पूरी तरह कॉपी नहीं कर सकता। भारत में शिक्षा प्रणाली का रटने पर अधिक और स्किल पर कम जोर देना इस चुनौती को और बढ़ा देता है।
AI के दौर में जिम्मेदारी सिर्फ व्यक्ति की नहीं है। सरकार को स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स को AI-फ्रेंडली बनाना होगा और कंपनियों को कर्मचारियों को हटाने की बजाय री-स्किल और अप-स्किल करने पर निवेश करना चाहिए। अगर AI को केवल मुनाफे का औजार बनाया गया, तो असमानता बढ़ेगी। लेकिन अगर इसे मानव क्षमता बढ़ाने के साधन के रूप में अपनाया गया, तो यह रोजगार का दुश्मन नहीं, बल्कि साथी साबित हो सकता है।
