20 मिनट भी नहीं टिक रहा छात्रों का ध्यान विभिन्न शिक्षण संस्थानों द्वारा किए गए आंतरिक सर्वेक्षणों में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह पाया गया है कि आज का औसत छात्र किसी एक विषय पर लगातार 20 से 25 मिनट से अधिक समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा है। पढ़ाई के दौरान हर कुछ मिनटों में मोबाइल स्क्रीन चेक करने की आदत ने उनकी सीखने की क्षमता को बाधित किया है। शिक्षाविदों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षणिक परिणामों में बड़ी गिरावट देखी जा सकती है।
मल्टीटास्किंग का बोझ और घटती कार्यक्षमता यही स्थिति कॉर्पोरेट कार्यालयों की भी है। दफ्तरों में कर्मचारियों पर एक साथ कई प्रोजेक्ट्स संभालने का दबाव होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ‘मल्टीटास्किंग’ दरअसल एक भ्रम है। जब मस्तिष्क बार-बार एक काम से दूसरे काम पर स्विच करता है, तो वह कॉग्निटिव लोड मानसिक भार बढ़ा देता है, जिससे काम की गुणवत्ता गिर जाती है और कर्मचारी जल्दी मानसिक थकान महसूस करने लगते हैं।
क्या हैं इस समस्या के मुख्य कारण? मनोवैज्ञानिकों ने फोकस खोने के पीछे तीन प्रमुख कारणों को रेखांकित किया है अनियंत्रित स्क्रीन टाइम: सोशल मीडिया और ऐप्स के नोटिफिकेशन डोपामाइन रिलिज़ करते हैं, जो हमें बार-बार फोन देखने को मजबूर करते हैं। अनियमित दिनचर्या नींद की कमी और शारीरिक गतिविधि का अभाव मानसिक स्पष्टता को खत्म कर देता है। डिजिटल शोर: हर वक्त सूचनाओं के अंबार के बीच मस्तिष्क को ‘विश्राम’ नहीं मिल पा रहा है।
समाधान की ओर बढ़ते कदम डिजिटल डिटॉक्स और वर्कशॉप इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए अब संस्थानों ने सक्रिय कदम उठाना शुरू कर दिया है। कई स्कूल और कॉलेज अब ‘डिजिटल डिटॉक्स’ सत्र आयोजित कर रहे हैं, जहाँ छात्रों को बिना गैजेट्स के समय बिताने और एकाग्रता बढ़ाने के गुर सिखाए जा रहे हैं। वहीं, सरकारी स्तर पर भी छात्रों के लिए काउंसलिंग और मानसिक सहायता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों की सलाह कैसे बढ़ाएं अपना फोकस करियर काउंसलरों ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए हैं मोनोटास्किंग’ अपनाएं: एक समय में केवल एक ही काम पर पूरा ध्यान दें।
फोन को रखें दूर काम या पढ़ाई के समय मोबाइल को न केवल साइलेंट करें, बल्कि उसे अपनी नजरों से दूर रखें। ब्रेक का नियम काम को छोटे हिस्सों में बांटें और हर एक घंटे बाद 5-10 मिनट का ‘स्क्रीन-फ्री’ ब्रेक लें। समय रहते यदि इस ‘डिजिटल डिस्ट्रैक्शन’ पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह न केवल व्यक्तिगत करियर बल्कि देश की समग्र कार्यक्षमता के लिए भी बड़ी चुनौती बन जाएगा।
