पूजा का शुभ मुहूर्त और तिथि श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन, अजमेर की निदेशिका एवं ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार, माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 23 जनवरी 2026 को अर्धरात्रि 02:28 बजे से प्रारंभ होगी और इसका समापन 24 जनवरी को अर्धरात्रि 01:46 बजे होगा। उदया तिथि की गणना के अनुसार, बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी को ही मनाया जाएगा। माँ सरस्वती की पूजा के लिए प्रातः 06:43 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक का समय सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है।
धार्मिक मान्यता: जब सृष्टि को मिली वाणी पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जब संसार की रचना की, तो उन्हें चारों ओर मौन और नीरसता महसूस हुई। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे श्वेत वस्त्रधारिणी माँ सरस्वती प्रकट हुईं। माँ ने अपनी वीणा का मधुर स्वर छेड़ा, जिससे समस्त संसार को वाणी, ध्वनि और चेतना प्राप्त हुई। इसी कारण बसंत पंचमी को ज्ञान और संगीत के उदय का पर्व माना जाता है।
शुभ कार्यों के लिए ‘अबूझ मुहूर्त ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार, यह दिन विद्या आरंभ, विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अत्यंत शुभ (अबूझ मुहूर्त) माना जाता है। इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का लग्न भी लिखा गया था। छोटे बच्चों के ‘अक्षरारंभ’ और ‘अन्नप्राशन’ संस्कार के लिए भी यह तिथि सर्वश्रेष्ठ है। पीले रंग का विशेष महत्व बसंत पंचमी पर चारों ओर पीला रंग छाया रहता है। पीला रंग सकारात्मक ऊर्जा, उल्लास और नवजीवन का प्रतीक है। इस दिन श्रद्धालु पीले वस्त्र धारण करते हैं और माँ सरस्वती को पीले पुष्प (विशेषकर गेंदा और सरसों के फूल), पीला चंदन, हल्दी और केसरिया मीठे चावल अर्पित करते हैं।
पूजा विधि और मंत्र
स्थापना: माँ सरस्वती की प्रतिमा को पीले वस्त्र पर स्थापित करें। र्पण: रोली, हल्दी, केसर और श्वेत या पीले पुष्प चढ़ाएं। पूजा स्थल पर अपनी पुस्तकें और वाद्य यंत्र अवश्य रखें। वंदना: ‘कुंदेंदुतुषारहारधवला. वंदना का पाठ करें। मंत्र जाप: ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ मंत्र का जाप करने से बुद्धि और एकाग्रता में वृद्धि होती है। सकारात्मक ऊर्जा के उपाय घर में रचनात्मक माहौल के लिए वीणा रखना शुभ होता है। ज्योतिषाचार्या बताती हैं कि मंदिर में मोर पंख रखने से नकारात्मकता समाप्त होती है और हंस की तस्वीर मानसिक शांति और एकाग्रता को बढ़ाती है। बसंत पंचमी से शुरू होने वाला यह वसंतोत्सव होलिका दहन तक जारी रहता है।
