नौकरी के पीछे भागनेवाला युवा इस तरह बन गया नौकरी देनेवाला
शुभम की शुरुआत प्रेरणादायक है। मास्टर्स डिग्री कर चुके, जब माइनिंग इंजीनियरिंग की नौकरी में मेडिकल अनफिट होकर बाहर हो गए तो उन्होंने ऑनलाइन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग क्लास शुरू की। और फिर इसी दौरान मिलेट के बारे में जानकारी प्राप्त हुई और फिर शुरुआत हुई ग्रेनॉक्सी की। हालांकि इससे जुड़ी उनकी कहानी यूं है कि माइनिंग इंजीनियरिंग डिप्लोमा के बाद कोल माइंस की नौकरी के लिए मेडिकल अनफिट कलर ब्लाइंडनेस की वजह से बाहर कर दिया गया था। इस पर शुभम ने हार नहीं मानी और सकारात्मक सोच के साथ ऑनलाइन कंप्टीशन एग्जाम की तैयारी करवाने के लिए यूट्यूब चैनल और एप्लीकेशन बनाया, जोकि देखते ही देखते सफलता की ऊंचाइयों को छूने लगा, आज जिसमें लगभग दो लाख से ऊपर बच्चे जुड़ चुके हैं और लगभग 84 बच्चों का शासकीय नौकरी में चयन भी हो चुका है।

इस बीच शुभम ने सोचा, क्यों न कुछ ऐसा करें जो स्वास्थ्य से जुड़ा हो; अपने आस-पास का जनजाति बहुल्य क्षेत्र होने पर परंपरागत मोटे अनाज (मिलेट्स) पर नजर पड़ी, कोदो, कुटकी, रागी, ज्वार, बाजरा जैसे अनाज जो ‘सुपरफूड’ हैं क्योंकि ये पोषक तत्वों से भरपूर हैं। शुभम ने इन पर तीन साल तक रिसर्च की। स्थानीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों से सलाह ली। मिलेट्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू बढ़ाने वाली नई तकनीकें विकसित कीं। नतीजा! रस्स, आटा, सूजी, रवा, पास्ता, मैकरोनी, बेकरी आइटम्स और 14 तरह की कुकीज इन मोटे अनाज पर आधारित कर तैयार हो गईं! ये उत्पाद सभी के लिए स्वादिष्ट होने के साथ ही स्वास्थ्य वर्धक भी हैं।
आपका स्टार्टअप भी चमक सकता है!
पैसे जुटाने में भी शुभम ने कमाल कर दिखाया। उद्यमियों, और किसानों को जोड़ा, ग्रामीण रोजगार बढ़ाया। राज्य के उद्यानिकी विभाग से भी 10 लाख रुपए का आर्थिक सहयोग लिया, एक बैंक उन्हें 50 लाख रुपए देने आगे आई, फिर इस पूंजी से दो करोड़ की लागत वाली फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई। नेशनल हाईवे 43 पर बुढ़ार के साबो में स्थित ये यूनिट मध्य प्रदेश के शहडोल संभाग की पहली ऐसी सुविधा है, जहां 12 तरह के मिलेट्स प्रोसेस हो रहे हैं। जर्मनी से आठ (कुल 12 में से) अत्याधुनिक मशीनें मंगाईं, जो एक ही छत के नीचे पूरी प्रोसेसिंग कर रही हैं। एक घंटे में एक टन अनाज तैयार!
शुभम तिवारी कहते हैं, “सरकारी नौकरी के शुरूआती प्रयासों में असफल होने पर मैंने तुरंत निर्णय ले लिया था कि अब स्वयं के लिए नौकरी नहीं चाहिए, वे नौकरी देनेवाले बनेंगे। इसलिए मैं अपनी इस सोच के साथ स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ा। मेरा तो यही कहना है कि प्रत्येक युवा को सकारात्मक नजरिया रखते हुए अपने प्रयास जिस भी फील्ड में हैं वहां करना चाहिए, सफलता कभी शीघ्र अन्यथा कुछ देर से मिलती जरूर है।”
शुभम का व्यक्तित्व प्रेरणा का स्रोत है। सकारात्मक सोच, लगातार प्रयोग यही उनकी सफलता के औजार हैं। उनके इस प्रयास ने आज शहडोल जैसे जनजाति बहुल्य क्षेत्र के गरीब किसानों को भी आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है, क्योंकि अब किसानों को उनकी फसल के उचित दाम उनके खेत में ही सुलभ हो रहे हैं। शुभम तिवारी की टीम इन किसानों से मोटा अनाज उनके खेत में जाकर एकत्र करती है।

रोजगार पर फोकस
शुभम शहडोल संभाग तक ही सीमित नहीं रहे हैं, वे इससे बाहर निकलकर जबलपुर भी अपने नवाचारों को लेकर पहुंचे हैं। जबलपुर के गोरखपुर थाने के पास महर्षि विद्या मंदिर के सामने में ग्रेनॉक्सी सुपरफूड कैफे उन्होंने शुरू किया है, जिसमें हेल्दी मिलेट से बने पिज्जा, बर्गर, सैंडविच, इडली, डोसा, कप केक, बिरयानी, पास्ता, नूडल्स मिलते हैं।
उनका साफ कहना है, “भविष्य में निर्यात बढ़ेगा तो हम अधिक रोजगार देनेवाले बनेंगे, इसके लिए नई युनिट होना भी जरूरी है” वे बताते हैं कि “मैं एसएचजी की महिलाओं को प्रशिक्षण दे रहा हूँ जिससे वो भी सीखकर हमारे साथ या फिर स्वयं का रोजगार शुरू कर सके। इनक्यूबेशन सेंटर और एक्सपोर्ट पर अपने एनजीओ जिसका नाम शुभम करोती कल्याणम यूथ सोसाइटी है, उसके माध्यम से अन्यों की सहायता के लिए मैं उन लोगों की मदद के लिए भी आगे आ रहा हूं जिनके पास पैसे का अभाव है वो इन्वेस्टर से जुड़कर पैसे और मेंटरशिप प्राप्त कर सकते हैं और एक्सपोर्ट के माध्यम से अपने प्रोडक्ट्स को ग्लोबल मार्केट तक पहुंचा सकते हैं।”
इस बीच शुभम तिवारी ये भी कहते हैं, “जिस तरह से माननीय प्रधानमंत्री जी ने शहडोल को फुटबॉल के लिए वैश्विक मंच पर मिनी ब्राजील के नाम से विश्व विख्यात किया है। उसी तरह से मैं मिलेट (श्री अन्न) को जो ओडीओपी प्रोडक्ट भी हैं, उसके लिए शहडोल को मिलेट हब बनाना चाहता हूं ताकि विश्व स्तर पर यहां का मिलेट लोगों के घर तक पहुंचे।” वे कहते हैं, “मेरा लक्ष्य मुनाफा नहीं, आत्मनिर्भर भारत है।” युवाओं और बेरोजगारों के लिए शुभम तिवारी का संदेश साफ है कि हार मत मानो! रिसर्च करो, सोशल मीडिया अपनाओ, सरकार के अनुदान लो। छोटे से स्टार्टअप से विश्व बाजार तक पहुंचो।
