मानवाधिकार आयोग ने लिया स्वतः संज्ञान
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की अध्यक्षता कर रहे प्रियंक कानूनगो ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वयं संज्ञान लिया। आयोग ने भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, एम्स भोपाल के निदेशक और भोपाल पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर 15 दिनों में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट में POSH कमेटी की कार्यवाही, एफआईआर की प्रति और पोस्टमार्टम रिपोर्ट अनिवार्य रूप से शामिल करनी होगी।
ट्वीट से सामने आया मामला
आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर मामले का ब्यौरा साझा किया। उन्होंने बताया कि महिला चिकित्सक ने तीन बार HOD पर प्रताड़ना की शिकायत की, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने कार्रवाई करने के बजाय मामले को दबाने का प्रयास किया। इससे डॉक्टर ने आत्महत्या का कदम उठाया।
आरोप-शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई
शिकायत के अनुसार, विभागाध्यक्ष द्वारा लगातार मानसिक दबाव, सार्वजनिक अपमान और पेशेवर बाधाएं उत्पन्न की गईं। डॉक्टर ने संस्थान की आंतरिक शिकायत प्रणाली (POSH कमेटी) के तहत शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन आरोप है कि प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। यदि यह साबित होता है, तो मामला केवल व्यक्तिगत उत्पीड़न नहीं बल्कि संस्थागत लापरवाही का उदाहरण बनेगा।
POSH कमेटी और पुलिस जांच पर निगाह
आयोग ने विशेष रूप से POSH कमेटी की कार्यवाही का ब्यौरा मांगा है। यदि शिकायत दर्ज होने के बावजूद उचित जांच या कार्रवाई नहीं हुई, तो यह नियमों के उल्लंघन में आएगा। साथ ही, भोपाल पुलिस से भी संपूर्ण जांच रिपोर्ट मांगी गई है, जिसमें यह देखा जाएगा कि उकसाने या मानसिक प्रताड़ना के तहत क्या कदम उठाए गए।
15 दिन में रिपोर्ट, आगे की कार्रवाई तय
आयोग ने स्पष्ट किया है कि 15 दिनों में रिपोर्ट पेश करनी होगी, जिसके आधार पर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई का दिशा-निर्धारण होगा। आयोग ने पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
पूर्व में भी उठे थे सवाल
मामले से जुड़े लोग बताते हैं कि डॉक्टर एक मेधावी और समर्पित चिकित्सक थीं। उनकी असामयिक मृत्यु ने परिवार और चिकित्सा समुदाय दोनों को झकझोर दिया है। कई चिकित्सकों ने स्वीकार किया कि मेडिकल संस्थानों में कार्यदबाव और प्रशासनिक तनाव गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है।
एम्स भोपाल में हुई इस दुखद घटना ने संस्थागत शिकायत निवारण तंत्र की निष्पक्षता और कार्यसंस्कृति की गंभीर समीक्षा की आवश्यकता को उजागर किया है। मानवाधिकार आयोग की स्वतः पहल और 15 दिन में मांगी जाने वाली रिपोर्ट इस मामले की कानूनी और प्रशासनिक सच्चाई सामने लाएगी।
