कार्यक्रम के दूसरे दिन मंच पर सात वक्ताओं ने भाग लिया और अपने अनुभवों को साझा करते हुए महिलाओं की स्थिति पर अपने विचार रखे। इस दिन की थीम थी ‘प्रकृति और संस्कृति’, जिसमें सिनेमा और मीडिया द्वारा महिलाओं की छवि पर पड़ने वाले सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पर चर्चा हुई। पैनल में दंगल, एनिमल, कबीर सिंह और मिर्जापुर जैसी फिल्मों का जिक्र किया गया, जिनमें महिलाओं को वस्तु की तरह दिखाया गया और खुले तौर पर नशे को बढ़ावा देने वाले दृश्य शामिल थे।
इस विषय पर अपनी बात रखते हुए पत्रकार और विचारक Kiran Chopra ने कहा कि सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म दर्शकों पर बहुत बड़ा प्रभाव डालते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दंगल फिल्म में पहलवानी सीखती लड़की को दिखाया गया, जिससे लोगों को प्रेरणा मिली और बेटियों को आगे बढ़ाने की सोच उत्पन्न हुई। वहीं दूसरी ओर ऐसी फिल्में भी आईं, जिनमें शराब का गिलास सिर पर रखकर डांस किया गया और इसके बाद यह ट्रेंड सोशल मीडिया और घरों तक फैल गया।
किरण चोपड़ा ने स्पष्ट किया कि महिलाओं को मीडिया और सिनेमा में वस्तु की तरह दिखाया जाना गलत है। उन्होंने कहा कि महिलाएं भावनात्मक रूप से संवेदनशील होती हैं और कभी-कभी अपने कदम उठाने में हिचकिचाती हैं, लेकिन उन्हें अपनी शक्तियों का एहसास होना चाहिए। महिला जब अपने भीतर की क्षमता को पहचान लेगी तब समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है।
सम्मेलन में संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष Sandhya Purecha ने भी महिलाओं के सशक्तिकरण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय सौंदर्यशास्त्र और वेद-पुराणों में स्त्री को शक्ति का रूप माना गया है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में घरेलू हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं, जबकि हमारे पुराणों में यह अपराध माना गया है। उन्होंने अतीत की शिक्षाओं से सीख लेकर महिलाओं के प्रति सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
सम्मेलन में यह भी स्पष्ट किया गया कि महिला सशक्तिकरण केवल शिक्षा और रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भर बनने के अवसर देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस आयोजन ने सिनेमा और मीडिया में महिलाओं की छवि सुधारने की दिशा में एक चेतावनी और सुझाव के रूप में काम किया।
