प्रभुनाथ त्रिपाठी, काशी निवासी, बताते हैं, “मंगलवार को ‘बुढ़वा मंगल’ के साथ होली की खुमारी का समापन होता है। यह सालों पुरानी रीत है, जिसमें खान-पान, गुलाल और संगीत का भी आनंद लिया जाता है।”
गंगा घाटों पर संगीत और भक्ति
इस महफिल का मुख्य आकर्षण गंगा घाट होते हैं। दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक बजड़े (नावों) सजाए जाते हैं और लोकगायक तथा कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। फूलों, गद्दों, मसनद और इत्र की खुशबू से महकते घाट शाम को संगीत की महफिल में बदल जाते हैं।
बनारस घराने की होरी, चैती, ठुमरी, बिरहा और कजरी की मधुर धुनें गूंजती हैं। कभी उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई, गिरिजा देवी की चैती, पंडित किशन महाराज का तबला और सितार की झंकार रातभर लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। आज भी लोकगायक मां गंगा और हनुमान जी के चरणों में अपनी कला अर्पित करते हैं।
घाटों की रंगीन छटा
बुढ़वा मंगल के दिन दशाश्वमेध से अस्सी घाट तक संगीत, रंग और उत्सव का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। लोकगायक और कलाकार गंगा में खड़े बजड़े पर प्रस्तुति देते हैं। बनारसी घराने की धुनें शाम को सुरम्य और सुरीली बना देती हैं।
यह महफिल काशी के अक्खड़पन, फक्कड़पन और आध्यात्मिकता का संगम प्रस्तुत करती है। सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभव भी है।
देश-विदेश से सैलानी
इस दिन काशी में देश-विदेश से सैलानी भी पहुंचते हैं। वे गंगा तट पर बिखरे रंग, संगीत और बनारसी जोश का आनंद लेते हैं। घरों में स्वादिष्ट पकवान बनते हैं, मित्र और रिश्तेदार अंतिम होली मिलन करते हैं, और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है।
