अविवाहित महिलाएं अच्छे वर और सुखी परिवार की कामना के लिए पूजा करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि और घर की शांति के लिए गणगौर की आराधना करती हैं।
राजस्थान से विशेष पोशाक और लकड़ी की मूर्तियां
भार्गव नगर निवासी पूर्वा व्यास ने बताया कि वह 8 साल की उम्र से गणगौर पूजा कर रही हैं और आज भी अपनी मम्मी और भाभी के साथ यह परंपरा निभाती हैं। उनके घर में गणगौर जी, ईश्वर जी और भाया जी की विशेष लकड़ी की मूर्तियां हैं, जिन्हें हर साल बीकानेर से लायी गई पोशाक और आभूषण पहनाकर सजाया जाता है।
पूर्वा के अनुसार, उनके पास 15 से अधिक पोशाकें हैं, और पूजा के दौरान प्रतिदिन मूर्तियों को नहलाया जाता है। इसके बाद फूल-माला, नए कपड़े और आभूषण पहनाकर भजन, गीत और आरती की जाती है, जिसमें लगभग एक-दो घंटे का समय लगता है।पूर्वा के अनुसार, उनके पास 15 से अधिक पोशाकें हैं, और पूजा के दौरान प्रतिदिन मूर्तियों को नहलाया जाता है। इसके बाद फूल-माला, नए कपड़े और आभूषण पहनाकर भजन, गीत और आरती की जाती है, जिसमें लगभग एक-दो घंटे का समय लगता है।
पूजा विधि और अनुष्ठान
गणगौर पूजा की विधियां अलग-अलग स्थानों पर भिन्न होती हैं। कुछ जगहों पर पुरुषों को पूजा में प्रवेश की अनुमति नहीं होती, जबकि अन्य जगहों पर सभी लोग शामिल हो सकते हैं।शाम को कलश में अंगूठी या नए रूमाल के माध्यम से जल अर्पित किया जाता है।शीतला सप्तमी से समाज में फूलपाती भी निकाली जाती हैं, जिसमें महिलाएं और लड़कियां दूल्हा-दुल्हन बनकर नाच-गाते हुए पूजा की परंपरा निभाती हैं।
