डॉ. मयंक चतुर्वेदी।
भारत की रक्षा यात्रा आज वैश्विक रक्षा संतुलन में एक निर्णायक भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लंबे समय तक रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भर रहने वाला भारत वर्तमान दौर में आत्मनिर्भरता की राह पर दृढ़ता से अग्रसर है। वह एक उभरते हुए रक्षा निर्यातक के रूप में विश्व भर में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। इस परिवर्तन की पुष्टि हाल ही में सामने आए आधिकारिक आंकड़ों और सरकारी बयानों से भी होती है, जोकि इस बात का प्रमाण हैं कि भारत की रक्षा नीति अब उपभोग के स्थान पर बदलकर उत्पादन और निर्यात की नीति बन चुकी है।
वित्त वर्ष 2025-26 के समाप्त होते ही जब रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक आंकड़े जारी किए, तब यह और गहराई से स्पष्ट हो गया कि भारत ने इस क्षेत्र में एक नई ऊंचाई हासिल कर ली है। मंत्रालय के अनुसार, इस अवधि में देश का कुल रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसे आप अब तक का सर्वाधिक मान सकते हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह आंकड़ा पिछले वित्त वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये की तुलना में 14,802 करोड़ रुपये अधिक है, यानी 62.66 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हमें यहां दिखाई देती है ।
इस उपलब्धि का उल्लेख स्वयं देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से किया है। उन्होंने इस वृद्धि को भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता में बढ़ते वैश्विक विश्वास का प्रतीक बताया। निश्चित ही जब किसी देश का रक्षा मंत्री इस प्रकार की उपलब्धि को वैश्विक भरोसे से जोड़ता है, तब अवश्य ही स्पष्ट हो जाता है कि यह सफलता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त कर रही है। रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी यह जानकारी और उस पर आधारित राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टें इस तथ्य को और मजबूत करती हैं कि भारत का “रक्षा निर्यात” अब एक स्थायी और निरंतर बढ़ने वाली प्रक्रिया बन चुका है। यह भी उल्लेखनीय है कि “भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है।”
इस निर्यात वृद्धि के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, वह है; “स्वदेशी उत्पादन में आई मजबूती।” पिछले एक दशक में भारत ने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों के माध्यम से रक्षा क्षेत्र में व्यापक सुधार किए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य एक ऐसा मजबूत रक्षा औद्योगिक ढांचा तैयार करना रहा, जिसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी टिकाया जाना संभव हो सके। वस्तुत: वर्तमान में जब हम इन आंकड़ों को देखते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रयास सफल रहे हैं।
रक्षा निर्यात के इस बढ़ते आकार में ‘ब्रह्मोस’ और ‘आकाश मिसाइल प्रणाली’, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट ‘तेजस’ और अन्य स्वदेशी उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये सभी उत्पाद भारत की तकनीकी क्षमता और अनुसंधान दक्षता के प्रतीक हैं। इनकी वैश्विक मांग इस बात का संकेत है कि भारतीय रक्षा उद्योग अब गुणवत्ता और विश्वसनीयता दोनों के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतर रहा है।
इस पूरी प्रक्रिया में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संयुक्त भागीदारी भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, कुल निर्यात में जहां सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की हिस्सेदारी 54.84 प्रतिशत है, वहीं निजी क्षेत्र का योगदान भी 45.16 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यह संतुलन इस बात का संकेत है कि भारत ने रक्षा उत्पादन में एक समावेशी मॉडल विकसित किया है, जिसमें दोनों क्षेत्र मिलकर काम कर रहे हैं। निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी ने आज भारत की उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया है, वहीं इसके माध्यम से सतत नवाचार और प्रतिस्पर्धा को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
इसी संदर्भ में ‘प्रहार’ लाइट मशीन गनों का स्वदेशी निर्माण एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिन्हें अडानी की रक्षा कंपनी ‘अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस’ द्वारा तैयार किया गया है। वस्तुत: यह इस बात का संकेत भी है कि भारत अब छोटे से लेकर अत्याधुनिक हथियारों तक, हर स्तर पर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। वैश्विक परिदृश्य ने भी भारत के इस उभार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है। पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं की सीमाओं ने कई देशों को नए विकल्पों की तलाश के लिए मजबूर किया है। ऐसे समय में भारत एक स्थिर, विश्वसनीय और किफायती विकल्प के रूप में उभरा है। अब इसकी सफलता को देखते हुए ही सरकार ने 2029 तक रक्षा उत्पादन को 03 लाख करोड़ रुपये और निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
अत: यहां कहना यही है कि भारत की यह यात्रा, आयातक से निर्यातक बनने की जो वर्तमान तक रही, वह सिर्फ आर्थिक या औद्योगिक परिवर्तन तक सीमित नहीं है, यह आज के समय में एक व्यापक राष्ट्रीय आत्मविश्वास का प्रतीक है। आधिकारिक आंकड़े, रक्षा मंत्रालय की रिपोर्टें और उच्च स्तर के सरकारी बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि रक्षा क्षेत्र का यह परिवर्तन वास्तविक और दीर्घकालिक है। आज का भारत अपने लिए हथियार खरीदने तक सीमित रहनेवाला देश न होकर उन्हें बनाने वाला देश बन चुका है। वह दुनिया को सुरक्षा समाधान प्रदान करने वाला एक विश्वसनीय साझेदार बन रहा है। यही आत्मनिर्भर भारत की वह सशक्त और प्रमाणिक पहचान है, जोकि हम सभी भारतीयों को गर्व से भर रही है। कहा भी गया है, बलहीनों को कोई न पूछे, बलवानों को विश्व पूजता…!
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