तहसील मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में हाई स्कूल की सुविधा नहीं होने के कारण छात्र-छात्राओं को पढ़ाई के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। खासकर बेटियों की शिक्षा पर इसका अधिक प्रभाव पड़ रहा है, जिससे कई परिवारों को मजबूरी में बच्चों की पढ़ाई बीच में ही रोकनी पड़ती है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने बार-बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
गांव में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश इस कदर बढ़ा कि पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार तक कर दिया था। उस समय भाजपा प्रत्याशी और वर्तमान विधायक धीरेंद्र बहादुर सिंह ने गांव पहुंचकर लोगों को आश्वासन दिया था कि चुनाव जीतने के बाद स्कूल खोलना उनकी प्राथमिकता होगी।
विधायक बनने के बाद उन्होंने इस मुद्दे को उठाते हुए कटनी से लेकर भोपाल तक कई बार पत्राचार किया। उन्होंने शिक्षा मंत्री से मुलाकात कर मामला विधानसभा में भी उठाया। वहीं शहडोल सांसद हिमाद्री सिंह भी पिछले कुछ वर्षों से लगातार शिक्षा विभाग के अधिकारियों को पत्र लिखकर इस समस्या के समाधान की मांग करती रही हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी अधिकारियों की सुस्ती पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि इस तरह की लापरवाही से सरकार की छवि प्रभावित होती है और जनता का विश्वास कमजोर होता है।
इस मामले पर विधायक धीरेंद्र बहादुर सिंह का कहना है कि उन्होंने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा है और हाल ही में शिक्षा मंत्री से मुलाकात के बाद आश्वासन मिला है कि आगामी नए शैक्षणिक सत्र में खमरिया में हाई स्कूल शुरू कर दिया जाएगा।
वहीं शिक्षा विभाग के जबलपुर संभाग के संयुक्त संचालक अरुण इंगले ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में नहीं था, लेकिन अब जिला शिक्षा अधिकारी से रिपोर्ट मांगी गई है। उन्होंने आश्वासन दिया कि मुख्यमंत्री की घोषणा पूरी क्यों नहीं हुई, इसकी जांच की जाएगी और जल्द ही समस्या का समाधान किया जाएगा।
यह मामला न केवल एक अधूरी सरकारी घोषणा का उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी किस तरह बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि वर्षों से लंबित यह वादा कब तक हकीकत में बदलता है।
