प्रदर्शन कर रही महिला श्रमिकों का कहना है कि उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के अनुसार भुगतान नहीं किया जा रहा है। वर्तमान में उन्हें 8 घंटे की शिफ्ट के लिए मात्र 225 रुपए दिए जा रहे हैं जो उनके अनुसार बेहद कम है और जीवन यापन के लिए पर्याप्त नहीं है। इतना ही नहीं ओवरटाइम के नाम पर भी केवल 25 रुपए प्रति घंटा दिया जा रहा है जिसे लेकर महिलाओं में भारी नाराजगी है।
महिला श्रमिकों ने आरोप लगाया कि कंपनी में ठेकेदारों के माध्यम से काम कराया जा रहा है और यही ठेकेदार उनका शोषण कर रहे हैं। उनका कहना है कि काम के दौरान उन्हें मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं कराई जातीं। कई महिलाओं ने यह भी बताया कि उन्हें ना तो भविष्य निधि यानी पीएफ का लाभ मिल रहा है और ना ही कर्मचारी राज्य बीमा यानी ईएसआईसी जैसी जरूरी सुविधाएं दी जा रही हैं। ऐसे में उनका सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र पूरी तरह कमजोर बना हुआ है।
प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने स्पष्ट कहा कि उन्हें सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम वेतनमान के अनुसार भुगतान मिलना चाहिए। उनका कहना है कि वे लगातार मेहनत कर रही हैं लेकिन इसके बावजूद उन्हें उनके हक का पैसा नहीं मिल रहा है। इस स्थिति को लेकर अब उनका आक्रोश खुलकर सामने आ गया है।
स्थिति को देखते हुए मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके। हालांकि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा लेकिन महिलाओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगी।
यह मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे औद्योगिक क्षेत्र में काम कर रही महिला श्रमिकों की स्थिति को उजागर करता है। कम मजदूरी असुरक्षित कार्य वातावरण और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसे मुद्दे लंबे समय से उठते रहे हैं लेकिन अब महिलाएं खुलकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रही हैं।
यदि समय रहते इस मामले का समाधान नहीं किया गया तो यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन और कंपनी प्रबंधन इस मुद्दे को किस तरह से सुलझाते हैं और क्या महिला श्रमिकों को उनका अधिकार मिल पाता है या नहीं।
