1 से 21 अप्रैल के बीच देश के पांच राज्यों में कुल 29167 मामलों में से लगभग 69 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले मध्यप्रदेश की है। इस अवधि में राज्य में 20164 घटनाएं दर्ज की गईं जो देश में सबसे ज्यादा हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि खेतों में पराली जलाने की प्रवृत्ति किस तेजी से बढ़ रही है और इसका असर पर्यावरण पर कितना व्यापक हो सकता है।
जिला स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का संसदीय क्षेत्र विदिशा इस मामले में सबसे आगे है जहां 2086 घटनाएं सामने आई हैं। इसके बाद उज्जैन में 2053 और रायसेन में 1982 मामले दर्ज किए गए हैं। होशंगाबाद में 1705 और सिवनी में 1369 घटनाएं सामने आई हैं। हालांकि यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ा कम बताया जा रहा है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल भी रिकॉर्ड स्तर पर मामले दर्ज हो सकते हैं।
यदि अन्य राज्यों से तुलना करें तो मध्यप्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है जहां इसी अवधि में 8889 मामले सामने आए हैं। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में यह संख्या काफी कम है जिससे यह स्पष्ट होता है कि मध्यप्रदेश में यह समस्या अधिक गंभीर हो चुकी है।
विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने के पीछे किसानों की मजबूरी भी एक बड़ा कारण है। गंजबासौदा स्थित कृषि महाविद्यालय के प्रोफेसर आशीष श्रीवास्तव बताते हैं कि गेहूं की कटाई के तुरंत बाद किसान ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई करना चाहते हैं और उनके पास समय बहुत कम होता है। ऐसे में पराली को हटाने के लिए वे सबसे आसान और सस्ता तरीका यानी जलाने का विकल्प चुनते हैं।
हालांकि इसके कई वैकल्पिक उपाय भी मौजूद हैं जिनका उपयोग करके इस समस्या को कम किया जा सकता है। किसान सुपरसीडर रोटावेटर मल्चर और रीपर जैसे कृषि यंत्रों का उपयोग कर सकते हैं जिससे पराली को मिट्टी में मिलाया जा सके। इसके अलावा भूसे का उपयोग पशु चारे के रूप में भी किया जा सकता है। पूसा डीकंपोजर का छिड़काव कर पराली को प्राकृतिक खाद में बदला जा सकता है जिससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है।
सरकार द्वारा पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया गया है और ऐसा करते पाए जाने पर किसानों पर जुर्माने का प्रावधान भी है जो 2500 से 15000 रुपए तक हो सकता है। बार बार उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है।
इसके बावजूद बढ़ते मामलों ने यह संकेत दिया है कि केवल नियम बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा बल्कि किसानों को जागरूक करने और उन्हें वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे। अन्यथा यह समस्या पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
