नई दिल्ली। नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की अलग से कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह उसकी मूल और स्वाभाविक पहचान का हिस्सा है।
अपने संबोधन में उन्होंने इस विचार को एक सहज और प्राकृतिक सत्य की तरह प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, जैसे सूरज का पूर्व दिशा से उगना एक स्थापित तथ्य है, जिसे साबित करने की जरूरत नहीं होती, वैसे ही भारत का हिंदू राष्ट्र होना भी एक स्वाभाविक वास्तविकता है। उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ समाज के विभिन्न वर्ग इस विचार को अधिक स्पष्टता से समझने लगे हैं।
कार्यक्रम में उन्होंने राम मंदिर निर्माण का उल्लेख करते हुए इसे एक लंबे समय से चले आ रहे संकल्प और सामूहिक प्रयास का परिणाम बताया। उनके अनुसार यह केवल एक धार्मिक परियोजना नहीं थी, बल्कि इसमें समाज के विभिन्न हिस्सों की सहभागिता और नेतृत्व की भूमिका शामिल रही है।
उन्होंने भारत के ऐतिहासिक विकास की चर्चा करते हुए कहा कि देश का पुनरुत्थान एक लंबी प्रक्रिया रही है, जिसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी हैं। समय के साथ यह यात्रा आगे बढ़ती रही और इसमें कई महत्वपूर्ण पड़ाव शामिल होते गए।
अपने विचारों में उन्होंने यह भी कहा कि भारत की पहचान उसके सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं और जीवन शैली में गहराई से जुड़ी हुई है। उनका मानना है कि देश की प्रगति केवल आर्थिक या राजनीतिक स्तर पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मजबूती के साथ भी जुड़ी होनी चाहिए।
अंत में उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि भारत का आगे बढ़ना केवल राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। उनके अनुसार, भारत की शक्ति उसके मूल मूल्यों और परंपराओं में निहित है, जो उसे एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
