यह प्रयोग सिर्फ एक तकनीकी टेस्ट नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था की झलक माना जा रहा है… आमतौर पर परमाणु रिएक्टर से निकलने वाली गर्मी का बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है, लेकिन इस प्रोजेक्ट में वैज्ञानिकों ने उसी गर्मी को इस्तेमाल करने का तरीका खोजा है… इसके लिए ‘ब्रेयटन साइकिल’ तकनीक अपनाई गई है, जिसमें पानी की भाप की जगह हीलियम गैस का उपयोग किया जाता है… यह गैस टरबाइन को घुमाकर बिजली पैदा करती है…
फिलहाल यह सिस्टम 2 से 3 किलोवाट बिजली पैदा कर रहा है, जो एक हाई-परफॉर्मेंस GPU—यानी AI के “दिमाग”—को चलाने के लिए पर्याप्त है… खास बात यह है कि यह सेटअप पारंपरिक पावर सिस्टम के मुकाबले काफी छोटा और ज्यादा कुशल है…
इस प्रोजेक्ट पर दुनियाभर के करीब 12 विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता काम कर रहे हैं… इसका मकसद सिर्फ बिजली बनाना नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए ‘माइक्रो-न्यूक्लियर रिएक्टर’ तैयार करना है… वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि 2030-31 तक ऐसे छोटे, सुरक्षित और कार्बन-फ्री रिएक्टर तैयार किए जाएं, जिन्हें सीधे इंडस्ट्री या डेटा सेंटर में लगाया जा सके…
दरअसल, भविष्य में AI और डेटा प्रोसेसिंग की जरूरतें इतनी तेजी से बढ़ेंगी कि पारंपरिक बिजली ग्रिड उस मांग को पूरा नहीं कर पाएंगे… ऐसे में छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर एक स्थायी और भरोसेमंद विकल्प बन सकते हैं इससे डेटा सेंटर को लगातार बिजली मिल सकेगी और बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन भी कम होगा…
सुरक्षा को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी इस तकनीक में छिपा है… ये माइक्रो-रिएक्टर बंद-लूप सिस्टम पर आधारित होंगे, जो पारंपरिक बड़े रिएक्टरों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित माने जा रहे हैं
कुल मिलाकर, AI और परमाणु ऊर्जा का यह मेल टेक्नोलॉजी की दुनिया में एक बड़ा बदलाव ला सकता है… अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो आने वाले समय में डेटा सेंटरों के पास अपने खुद के छोटे न्यूक्लियर पावर स्टेशन होंगे जो उन्हें लगातार, सस्ती और साफ ऊर्जा देंग।
