पहले जहां यह सफर करीब 20-22 दिनों में पूरा हो जाता था, अब वही यात्रा 35 से 50 दिन तक खिंच रही है। सुरक्षा कारणों से जहाज बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और लाल सागर के रास्ते से बच रहे हैं, जहां 2023 के अंत से हमलों का खतरा बना हुआ है।
इस बदलाव का सीधा असर लागत पर पड़ा है। लंबा रूट लेने से ईंधन खपत 30-50% तक बढ़ गई है, वहीं कंपनियों को समय पर डिलीवरी बनाए रखने के लिए ज्यादा जहाज लगाने पड़ रहे हैं। इससे कंटेनर शिपिंग दरों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिसका असर वैश्विक महंगाई और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, इस संकट ने अफ्रीका के समुद्री तटों को नया अवसर भी दिया है। मोरक्को का टैंजर मेड पोर्ट और सऊदी अरब का जेद्दा पोर्ट जैसे बंदरगाह तेजी से नए लॉजिस्टिक हब के रूप में उभर रहे हैं। जहाज अब यहां रुककर ईंधन भर रहे हैं और माल को आगे ट्रांसफर कर रहे हैं।
उधर, मिस्र को बड़ा झटका लगा है। सूएज नहर से होने वाली आय में भारी गिरावट आई है, क्योंकि जहाजों की संख्या तेजी से घटी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सिर्फ अस्थायी बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार के पैटर्न में बड़ा शिफ्ट हो सकता है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबा खिंचता है, तो केप ऑफ गुड होप का रूट स्थायी रूप से प्रमुख विकल्प बन सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि भू-राजनीतिक तनाव अब सीधे वैश्विक व्यापार और आम उपभोक्ताओं की जेब पर असर डाल रहा है जहां समुद्र का रास्ता बदलते ही पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो जाती है।
