स्थानीय स्तर पर तैयार हो रही ये ईंटें 6500 रुपए प्रति हजार के भाव से बिक रही हैं और ट्रैक्टर, आयसर व ट्रकों के जरिए धार, इंदौर, खरगोन सहित महाराष्ट्र के शाहदा तक पहुंचाई जा रही हैं। हालांकि इस व्यावसायिक गतिविधि का सबसे गंभीर असर पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
ग्रामीणों और चिकित्सकों का कहना है कि भट्टों से निकलने वाला धुआं आसपास के वातावरण को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। अस्पतालों में सांस संबंधी मरीजों की संख्या बढ़ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि खेतों पर गिरने वाली राख से फसल उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
नियमों के अनुसार मध्यप्रदेश गौण खनिज नियम 1996 और एनजीटी के प्रावधानों के तहत नदी किनारे 800 मीटर के दायरे में किसी भी ईंट भट्टे का संचालन प्रतिबंधित है। इसके अलावा जल संरचनाओं के 100 मीटर दायरे में भी खनन कार्य की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद कई भट्टे बैकवाटर से मात्र 200 मीटर की दूरी पर संचालित हो रहे हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि लगातार बढ़ता प्रदूषण न केवल नर्मदा के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है, बल्कि क्षेत्रीय स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था पर भी दीर्घकालिक असर डाल सकता है। प्रशासनिक कार्रवाई की मांग लगातार तेज हो रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
