सम्मेलन में कृषि सुधार, खरीफ फसलों की तैयारी, दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, उर्वरकों के संतुलित उपयोग तथा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने जैसे विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि कृषि भूमि की रक्षा केवल उत्पादन बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की सेहत और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कृषि नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि इसे टिकाऊ और संतुलित बनाना होना चाहिए।
केंद्र सरकार ने इस दौरान स्पष्ट किया कि रासायनिक उर्वरकों का पूरी तरह से निषेध सरकार का लक्ष्य नहीं है, बल्कि उनका वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना प्राथमिकता है। इसके लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाने और संस्थागत स्तर पर मजबूत निगरानी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। अधिकारियों ने सुझाव दिया कि इस दिशा में एक समन्वित तंत्र विकसित किया जाए, जिससे किसानों तक सही जानकारी और तकनीकी सहायता समय पर पहुंच सके।
सम्मेलन में यह भी रेखांकित किया गया कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्यों की सक्रिय भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। कई राज्यों ने अपने स्तर पर प्रयोगात्मक रूप से प्राकृतिक खेती को अपनाकर इसके सकारात्मक परिणामों को सामने रखा है, जिससे अन्य राज्यों में भी इस दिशा में रुचि बढ़ी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है तो इससे न केवल उत्पादन लागत कम हो सकती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरणीय संतुलन भी बेहतर हो सकता है।
राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन को एक ऐसे मंच के रूप में देखा गया, जहां केंद्र और राज्यों के बीच कृषि नीतियों को लेकर साझा दृष्टिकोण विकसित हुआ। यहां यह भी तय किया गया कि खरीफ फसलों की योजना अब केवल मौसमी तैयारियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे दीर्घकालिक कृषि रणनीति से जोड़ा जाएगा। इसमें दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, कृषि लागत में कमी, उत्पादन क्षमता में वृद्धि और मिट्टी के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाएगी।
कृषि क्षेत्र में इस तरह के समन्वित प्रयासों को विशेषज्ञ एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं, जो भविष्य में देश की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को एक साथ साधने में मदद कर सकते हैं। सरकार का मानना है कि कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है।
