राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा गत सप्ताह जारी किए गए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 26 की चौथी तिमाही में सालाना आधार पर अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी। यह दर पिछली तिमाही के लगभग समान है और इसके साथ एक सकारात्मक आश्चर्य भी जुड़ा हुआ है।
दरअसल राॅयटर्स के अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण ने 7.2 फीसदी की वृद्धि का अनुमान लगाया था। इस प्रकार वित्त वर्ष 26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अस्थायी अनुमान अब 7.7 फीसदी है जो पिछले वर्ष दर्ज 7.1 फीसदी से काफी अधिक है। वर्ष की दूसरी छमाही में अपेक्षित सुस्ती नहीं आई।
आंशिक रूप से इसका कारण राष्ट्रीय खातों में एक साथ चल रही आधार वर्ष में बदलाव की प्रक्रिया हो सकती है जिसमें स्थिर मूल्य गणनाओं के लिए आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया। इस बदलाव ने अन्य कुछ प्रणालीगत परिवर्तनों के साथ जीडीपी के स्तर को कम किया लेकिन वृद्धि दर को अधिक सुचारु और ऊंचा कर दिया।
इन परिवर्तनों का प्रभाव बहस का विषय बन सकता है। पहले भी सांख्यिकीय पद्धति में बदलावों के साथ ऐसा हुआ है। खासकर क्योंकि नॉमिनल जीडीपी केवल 8.9 फीसदी बढ़ा है जो यह दर्शाता है कि अपेक्षा से कम जीडीपी डिफ्लेटर (नॉमिनल और वास्तविक जीडीपी के बीच का अनुपात) ने इन विश्व-स्तरीय आंकड़ों को सहारा दिया। लेकिन यह भी ध्यान देना चाहिए कि सकारात्मक मांग प्रभाव पिछले सितंबर में संशोधित जीएसटी दर संरचना से और पहले दी गई आयकर राहत से लगातार सामने आते रहे।
क्षेत्रवार आंकडों के मुताबिक चौथी तिमाही में वृद्धि अपेक्षाकृत व्यापक रही। सेवाएं 9 फीसदी से अधिक बढ़ीं और विनिर्माण 10 फीसदी से अधिक। निजी उपभोग की वृद्धि पिछले तिमाही से कुछ कम होकर 7.6 फीसदी रही लेकिन सकल स्थिर पूंजी निर्माण की 8.2 फीसदी वृद्धि के साथ मिलकर यह पर्याप्त रही।
ध्यान रहे कि ये आंकड़े विशेष रूप से प्रभावशाली हैं क्योंकि फरवरी के अंत में खाड़ी संकट शुरू हुआ था जिससे तिमाही के एक-तिहाई हिस्से पर गंभीर वैश्विक दबाव पड़ा। सरकार ने अपने जिन कदमों के जरिये तेल कीमतों में वृद्धि के सबसे बुरे प्रभावों से अर्थव्यवस्था को बचाने की कोशिश की वे भी इस संदर्भ में मददगार रहे।
यद्यपि ऐसा बचाव हमेशा नहीं चल सकता। प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए कुछ खर्च नियंत्रण का आह्वान किया है तथा संकेत दिया है कि आगे और कठोर कदम उठाए जा सकते हैं। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि वर्तमान तिमाही और शायद जुलाई-सितंबर तिमाही भी चौथी तिमाही जैसी ही मजबूती दिखाएगी।
एनएसओ के वृद्धि अनुमान जारी होने से कुछ घंटे पहले ही भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट के चलते चालू वित्त वर्ष में वृद्धि 6.6 फीसदी तक ही रह सकती है जो पहले के 6.9 फीसदी अनुमान से कम है। मुद्रास्फीति के जोखिम भी मौजूद हैं। खासतौर पर माॅनसून के कमजोर रहने की आशंका के चलते।
भारत हमेशा वैश्विक ईंधन कीमतों के ऊंचे होने पर संघर्ष करता रहा है और कमजोर माॅनसून के प्रभाव से भी जूझता रहा है। यदि दोनों चुनौतियां एक साथ असर डालें तो यह गंभीर समस्या होगी। रिजर्व बैंक चिंतित है कि ऊंची ऊर्जा कीमतें और वैश्विक आपूर्ति अवरोध पहले से ही अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे ईंधन कीमतों का असर व्यापक अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा वैसे-वैसे ये प्रभाव और तीव्र होंगे।
इन चुनौतियों के बीच यह सौभाग्य है कि भारत साल की शुरुआत अपेक्षाकृत ऊंची वृद्धि के साथ कर रहा है। अब यह तो समय ही बताएगा कि घरेलू मजबूती कितनी टिकाऊ रहती है। लेकिन सरकार को वैश्विक उथल-पुथल के बीच वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए ठोस और स्थायी सुधारों पर अमल करना होगा ताकि भारत की आर्थिक ढाल मजबूत हो सके।
