यह किस्सा जुड़ा है साल 1978 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ से। निर्देशक प्रकाश मेहरा की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए थे। फिल्म में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, रेखा और राखी जैसे सितारों ने अभिनय किया था। कहानी, संवाद, संगीत और अभिनय के साथ-साथ इसका भावनात्मक क्लाइमेक्स भी दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।
फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने तैयार किया था, जबकि गीतकार अंजान ने इसके गीत लिखे थे। फिल्म के अधिकांश लोकप्रिय गीत किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड किए गए थे। ‘ओ साथी रे’, ‘रोते हुए आते हैं सब’ और टाइटल ट्रैक जैसे गीत उस दौर के सुपरहिट गानों में शामिल रहे। हालांकि फिल्म के अंतिम और सबसे भावनात्मक दृश्य के लिए संगीतकारों को कुछ अलग चाहिए था।
कहा जाता है कि जब फिल्म के क्लाइमेक्स में सिकंदर की मौत का दृश्य फिल्माया गया, तब संगीतकार आनंदजी को लगा कि इस दृश्य में जिस दर्द, विरह और भावनात्मक गहराई की जरूरत है, उसे मोहम्मद रफी की आवाज से बेहतर कोई नहीं दे सकता। इसके लिए केवल चार लाइनों की आवश्यकता थी, लेकिन वे चार लाइनें पूरे दृश्य का भाव बदलने वाली थीं।
संगीतकारों के सामने एक चुनौती भी थी। फिल्म के लगभग सभी गीत किशोर कुमार गा चुके थे और ऐसे में सिर्फ चार लाइनों के लिए मोहम्मद रफी से अनुरोध करना उन्हें थोड़ा असहज लग रहा था। आखिरकार आनंदजी ने रफी साहब से संपर्क किया और अपनी बात रखी। बताया जाता है कि रफी ने पहले पूछा कि जब पूरी फिल्म के गाने किशोर कुमार गा रहे हैं तो यह हिस्सा भी उनसे ही क्यों नहीं गवाया जाता। तब आनंदजी ने उन्हें समझाया कि इस दृश्य के लिए जिस दर्द और आत्मीयता की जरूरत है, वह उनकी आवाज में ही संभव है।
रफी साहब ने इस अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने जिन चार पंक्तियों को अपनी आवाज दी, वे थीं- “जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी…”। इन पंक्तियों ने फिल्म के क्लाइमेक्स को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया। दर्शकों ने न सिर्फ अमिताभ बच्चन के अभिनय को सराहा, बल्कि रफी की दर्दभरी आवाज ने भी उस दृश्य को अमर बना दिया।
फिल्मी गलियारों में प्रचलित किस्सों के अनुसार, मोहम्मद रफी ने इन चार पंक्तियों के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था। व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने यह रिकॉर्डिंग की और अपनी संवेदनशील गायकी से दृश्य में ऐसी जान डाल दी कि यह हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक क्षणों में शामिल हो गया।
आज, दशकों बाद भी जब ‘मुकद्दर का सिकंदर’ का यह दृश्य या यह गीत सुनाई देता है, तो दर्शकों की भावनाएं उसी तरह उमड़ पड़ती हैं। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मोहम्मद रफी की कला, संवेदनशीलता और संगीत के प्रति उनके समर्पण का जीवंत उदाहरण माना जाता है।
