– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत आज वैश्विक निवेश का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां यहां अवसर देख रही हैं। अमेजन के सीईओ एंडी जेसी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हालिया मुलाकात और भारत में लगभग 1.24 लाख करोड़ रुपये के नए निवेश की घोषणा भी इसी विश्वास का प्रमाण है। अमेजन ने स्पष्ट किया है कि वह 2030 तक भारत में एआई, क्लाउड और डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करेगा। यह भारत की अर्थव्यवस्था, रोजगार और तकनीकी विकास के लिए निश्चित रूप से सकारात्मक समाचार है। पर इस उत्साह के बीच एक प्रश्न ऐसा है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
वस्तुत: प्रधानमंत्री मोदी जब दुनिया के निवेशकों को भारत आने का निमंत्रण देते हैं, तब क्या उन कंपनियों को यह भी नहीं बताया जाना चाहिए कि भारत केवल 140 करोड़ उपभोक्ताओं का बाजार होने तक सीमित न होकर हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक चेतना और सनातन परंपराओं का राष्ट्र भी है?
अमेजन भारत में जितना निवेश कर रहा है, उससे कहीं अधिक वह यहां के लोगों के विश्वास, भावनाओं और खरीदारी की शक्ति से लाभ भी अर्जित कर रहा है। ऐसे में यह अपेक्षा अस्वाभाविक नहीं है कि कंपनी भारतीय समाज की आस्थाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति भी सम्मानजनक व्यवहार करे। दुर्भाग्य से पिछले एक दशक का इतिहास इसके ठीक विपरीत संकेत देता है।
ताजा विवाद जून 2026 में सामने आए उस विज्ञापन को लेकर है, जिसमें महान गणितज्ञ और खगोलविद आर्यभट को आधुनिक परिवेश में दिखाकर ‘शून्य’ की अवधारणा को अमेजन की व्यावसायिक योजनाओं ‘जीरो डिलीवरी फीस’, ‘जीरो हैंडलिंग फीस’ और ‘जीरो सर्च फीस’ से जोड़ दिया गया। प्रश्न यह नहीं है कि विज्ञापन रचनात्मक था या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या भारत की वैज्ञानिक विरासत और ज्ञान परंपरा को भी बिक्री बढ़ाने का उपकरण बना दिया जाना चाहिए?
हमारे लिए आर्यभट उस भारत के प्रतीक हैं जिसने दुनिया को गणित और खगोल विज्ञान की नई दिशा दी। वे भारतीय प्रतिभा, ज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रतिनिधि हैं। ऐसे व्यक्तित्व को एक सामान्य विपणन अभियान का पात्र बना देना अनेक लोगों को असहज कर गया। यह असहजता इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह कोई पहली घटना नहीं है।
यदि पिछले बारह वर्षों के विवादों पर नजर डालें तो एक चिंताजनक श्रृंखला दिखाई देती है। वर्ष 2014 में अमेजन पर भगवान गणेश के चित्रों वाले परिधान सूचीबद्ध पाए गए। हिंदू संगठनों ने इसे करोड़ों लोगों की आस्था का अपमान बताया। विरोध के बाद उत्पाद हटाने पड़े। उसी वर्ष भगवान शिव, राम, राधा-कृष्ण और अन्य देवी-देवताओं की छवियों वाले वस्त्रों को लेकर भी विवाद हुआ। लोगों ने पूछा कि जिन प्रतीकों की पूजा की जाती है, उन्हें पैरों और निचले शरीर से जुड़े परिधानों पर प्रदर्शित करने की अनुमति आखिर क्यों दी गई?
2017 में मामला और गंभीर हो गया जब अमेजन कनाडा पर भारतीय तिरंगे वाले डोरमैट बिकते पाए गए। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान का विषय था। तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ा। भारत सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद कंपनी को उत्पाद हटाने पड़े। लेकिन इसके कुछ ही समय बाद भगवान गणेश, शिव, हनुमान, लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की छवियों वाले अंडरगारमेंट्स, स्केटबोर्ड और डोरमैट फिर बिक्री के लिए दिखाई दिए।
2019 में गणेश, लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं के चित्रों वाले डोरमैट और बाथरूम उत्पादों ने नए विवाद को जन्म दिया। दुनिया भर में रहने वाले हिंदुओं ने इसका विरोध किया। लाखों लोगों ने ऑनलाइन अभियान चलाए। सवाल वही था, क्या किसी अन्य धर्म या संस्कृति के पूजनीय प्रतीकों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया जाता?
इसके बाद विवाद केवल उत्पादों तक सीमित नहीं रहे। अमेजन प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘तांडव’ को लेकर धार्मिक भावनाएं आहत होने के आरोप लगे। फिर भगवद्गीता से संबंधित विवादित सामग्री को लेकर आपत्तियां सामने आईं। देवी काली के चित्रण वाली पुस्तकों पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं। और अब आर्यभट का मामला सामने है।
इन सभी घटनाओं को अलग-अलग देखने पर कोई कह सकता है कि यह महज संयोग हैं, लेकिन जब एक ही कंपनी बार-बार भारतीय प्रतीकों, हिंदू आस्था, धार्मिक ग्रंथों, देवी-देवताओं, राष्ट्रीय ध्वज और अब वैज्ञानिक विरासत से जुड़े विवादों में घिरती है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में भारतीय संवेदनशीलताओं को समझने का कोई गंभीर प्रयास किया गया है?
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि अमेजन भारत से अभूतपूर्व आर्थिक लाभ अर्जित कर रहा है। कंपनी स्वयं दावा करती है कि उसने लाखों रोजगार सृजित किए हैं, करोड़ों छोटे व्यापारियों को डिजिटल मंच उपलब्ध कराया है और भारत को निर्यात केंद्र के रूप में विकसित करने में योगदान दिया है। यह सब सराहनीय है, लेकिन सम्मान केवल आर्थिक योगदान से नहीं मिलता। सम्मान उस दृष्टिकोण से मिलता है जिसमें किसी देश की संस्कृति, परंपरा और सभ्यता के प्रति संवेदनशीलता दिखाई देती है।
भारत ने हमेशा विदेशी निवेश का स्वागत किया है। भारतीय संस्कृति की विशेषता ही समावेशिता रही है। लेकिन समावेशिता का अर्थ यह नहीं कि यहां की आस्था और सांस्कृतिक प्रतीकों को व्यावसायिक प्रयोगशाला बना दिया जाए। यदि कोई भारतीय कंपनी किसी पश्चिमी देश में जाकर वहां के राष्ट्रीय प्रतीकों, धार्मिक मान्यताओं या ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का इसी प्रकार व्यावसायिक उपयोग करे, तो वहां भी तीखी प्रतिक्रिया होगी। फिर भारत के मामले में ऐसी घटनाओं को सामान्य रचनात्मक स्वतंत्रता कहकर क्यों टाल दिया जाता है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक दशक में भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर नई प्रतिष्ठा दिलाई है। योग को संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचाया, भारतीय विरासत को विश्व के सामने स्थापित किया और यह संदेश दिया कि आधुनिकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास साथ-साथ चल सकते हैं, इसलिए जब एंडी जेसी जैसे वैश्विक कॉरपोरेट नेता उनसे मिलते हैं, तब यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि उन्हें भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान का महत्व समझाया जाए।
भारत निवेश चाहता है, तकनीक चाहता है, रोजगार चाहता है; पर भारत अपनी स्व की चेतना की कीमत पर यह सब नहीं चाहता। भारत की सभ्यता कोई ब्रांड नहीं है, जिसे विज्ञापन की पटकथा में फिट कर दिया जाए। भारत की आस्था कोई उत्पाद नहीं है, जिसे बिक्री बढ़ाने के लिए पैकेजिंग का हिस्सा बना दिया जाए। भारत के ऋषि, वैज्ञानिक, देवी-देवता, धर्मग्रंथ और राष्ट्रीय प्रतीक इस देश की सामूहिक चेतना के स्तंभ हैं।
अमेजन यदि भारत में 4.60 लाख करोड़ रुपये का निवेश कर रहा है तो उसका स्वागत है, किंतु उतना ही आवश्यक यह भी है कि वह भारत की भावनाओं में भी निवेश करे। वह यह समझे कि यहां के लोग केवल ग्राहक नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं जो हजारों वर्षों से ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता की वाहक रही है।
आज जब एंडी जेसी और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात की तस्वीरें दुनिया देख रही हैं, तब करोड़ों भारतीयों की ओर से एक विनम्र किंतु स्पष्ट संदेश भी जाना चाहिए कि भारत में व्यापार कीजिए, निवेश कीजिए, विकास में भागीदार बनिए, लेकिन भारत की सनातन आस्था, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय गौरव को बाजार की वस्तु मत बनाइए। यही भारत की अपेक्षा है, यही भारतीय समाज का स्वाभिमान है और यही वह बात है जो शायद प्रधानमंत्री मोदी को अमेजन जैसे वैश्विक मंचों तक अवश्य ही पहुंचानी चाहिए।
