माइक्रोसॉफ्ट ने अपने बयान में बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान कंपनी की ओर से एच-1बी वीजा के लिए किए गए लगभग 6000 आवेदनों में से करीब 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों की वीजा स्थिति बदलने या उसे आगे बढ़ाने से संबंधित थे। कंपनी के अनुसार नए कर्मचारियों के लिए किए गए शेष आवेदन उन लोगों से जुड़े थे जो पहले से ही अमेरिका में कानूनी रूप से रह रहे थे। माइक्रोसॉफ्ट ने यह भी कहा कि एच-1बी वीजा से जुड़े कर्मचारी उसके अमेरिकी कार्यबल का लगभग एक प्रतिशत थे। कंपनी ने उन आरोपों को भी खारिज किया जिनमें विदेशी कर्मचारियों को अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन देने की बात कही गई थी। उसका कहना है कि एच-1बी वीजा पर काम करने वाले कर्मचारियों को अन्य कर्मचारियों के समान वेतन दिया जाता है।
यह विवाद उस समय बढ़ा जब अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग ने माइक्रोसॉफ्ट को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम यानी पीईआरएम से निलंबित करने की घोषणा की। इस कार्रवाई के तहत कंपनी के नए और लंबित आवेदनों को स्वीकार नहीं किए जाने की बात कही गई। रिपोर्ट के अनुसार एडोब और कई बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियां भी इस कार्रवाई के दायरे में आई हैं। अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले के पीछे चल रही संघीय जांच का हवाला दिया है। पीईआरएम कार्यक्रम विदेशी कर्मचारियों को स्थायी रूप से अमेरिका में काम करने और ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट की भर्ती नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि कंपनी ने लगभग 6000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से हटाया जबकि हजारों एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड का इस्तेमाल किया। हालांकि माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी वीजा नीति का बचाव करते हुए कहा कि उसके आंकड़ों को सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस विवाद ने अमेरिकी तकनीकी उद्योग में विदेशी कर्मचारियों की भूमिका और स्थानीय लोगों के रोजगार को लेकर बहस तेज कर दी है। भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में एच-1बी वीजा के माध्यम से काम करते हैं।
दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप ने सत्या नडेला के नेतृत्व की प्रशंसा की और माइक्रोसॉफ्ट को बदलने में उनकी भूमिका को सराहा। उन्होंने क्लाउड कंप्यूटिंग और सुपरइंटेलिजेंस जैसे तकनीकी क्षेत्रों में नडेला के योगदान का उल्लेख किया। इसके साथ ही अमेरिकी श्रम विभाग ने नौ प्रमुख विश्वविद्यालयों में जे-1 वीजा से जुड़े संभावित उल्लंघनों की ऐतिहासिक जांच की घोषणा भी की है। एफ-1 छात्र वीजा पर आने वाले विद्यार्थियों के वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम यानी ओपीटी के आवेदनों पर नए शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी सामने आया है। कुल मिलाकर अमेरिका में आव्रजन नियमों को सख्त बनाने की कोशिशों का असर तकनीकी कंपनियों विदेशी पेशेवरों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर पड़ सकता है। हालांकि प्रस्तावित शुल्क और प्रशासनिक फैसलों के अंतिम प्रभाव को समझने के लिए आधिकारिक अधिसूचनाओं और आगे के घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी होगा।
