जबलपुर। मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया है। आरक्षण को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने राज्य सरकार की कानूनी पैरवी पर सवाल उठाते हुए कहा कि हाईकोर्ट में आरक्षण के समर्थन में जरूरी आंकड़े और तथ्य मजबूती से पेश नहीं किए गए। वहीं प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ने ओबीसी आरक्षण के मामले में लोगों के साथ धोखा किया। दोनों नेताओं के बयानों के बाद प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है।
शनिवार को एक दिवसीय दौरे पर जबलपुर पहुंचे विवेक तन्खा ने कहा कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। हालांकि बाद में सरकार बदल गई और भाजपा सत्ता में आ गई। ऐसे में अध्यादेश और आरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधानों का बचाव करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी। तन्खा के मुताबिक किसी भी आरक्षण व्यवस्था को अदालत में मजबूती से साबित करने के लिए केवल राजनीतिक दावे पर्याप्त नहीं होते बल्कि उसके समर्थन में ठोस तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत करना भी जरूरी है।
तन्खा ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत रखने का सिद्धांत स्थापित किया था। इससे अधिक आरक्षण देने के लिए असाधारण परिस्थितियों को प्रमाणित करना आवश्यक होता है। इसके लिए सरकार को मात्रात्मक आंकड़े यानी क्वांटिफायबल डेटा प्रस्तुत करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार जरूरी आंकड़े प्रभावी ढंग से पेश नहीं कर पाई। यदि पर्याप्त तथ्य और आंकड़े अदालत के सामने रखे जाते तो संभव है कि मामले में अलग परिणाम सामने आता।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अब राज्य सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने का विकल्प मौजूद है। यदि सरकार ने विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी दायर की है तो यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। उनके अनुसार आरक्षण के पक्ष में कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को ठोस तथ्यों के साथ अदालत में पैरवी करनी चाहिए। तन्खा ने यह भी कहा कि अध्यादेश का बचाव करने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की होती है क्योंकि संबंधित विभागों के पास ही जरूरी आंकड़े और प्रशासनिक जानकारी उपलब्ध रहती है। राजनीतिक दल इस कानूनी प्रक्रिया में अपना पक्ष रख सकते हैं और सहयोग कर सकते हैं लेकिन सरकार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
दूसरी ओर लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने आरक्षण के मामले में जल्दबाजी की और पर्याप्त तैयारी के बिना विधेयक लाया। मंत्री के मुताबिक हाईकोर्ट के आदेश में विधेयक से जुड़ी कमियों का उल्लेख किया गया है और इसी वजह से मौजूदा स्थिति पैदा हुई। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि सभी वर्गों के साथ न्याय हो और आरक्षण से जुड़े मामले का कानूनी समाधान निकाला जाए।
ओबीसी आरक्षण को लेकर दोनों पक्षों के बयानों से साफ है कि यह मुद्दा आने वाले समय में भी प्रदेश की राजनीति में अहम बना रहेगा। एक तरफ कांग्रेस सरकार की कानूनी पैरवी और आंकड़ों को लेकर सवाल उठा रही है तो दूसरी तरफ भाजपा आरक्षण से जुड़े पुराने फैसलों और विधायी प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगे की कानूनी कार्रवाई पर रहेगी। अदालत में पेश किए जाने वाले तथ्य और आंकड़े ही इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
