उज्जैन । नवरात्रि के दौरान महाष्टमी का पर्व इस बार 18 और 19 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। उज्जैन में अष्टमी तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के बीच पूजन के समय को लेकर विशेष उत्सुकता है। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 27 मिनट पर शुरू हुई और 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि का आरंभ हो जाएगा। तिथि की अवधि और पूजा की पारंपरिक मान्यताओं के कारण कुछ घरों में रविवार को जबकि कुछ घरों में सोमवार सुबह महाष्टमी का पूजन किया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य अमर डिब्बेवाला के अनुसार जिन परिवारों में रात्रि के समय अष्टमी पूजन करने की परंपरा है वे 18 अक्टूबर को पूजा कर सकते हैं। वहीं सुबह पूजन करने वाले परिवार 19 अक्टूबर को अष्टमी तिथि के दौरान पूजा कर सकते हैं। परंपराओं और पंचांग की गणना में अंतर के कारण पूजा के समय में भिन्नता देखने को मिल रही है। ऐसे में श्रद्धालुओं को अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय तय करना चाहिए।
उज्जैन में सोमवार को नगर पूजा का भी आयोजन होगा। शहर के प्रसिद्ध चौबीस खंभा माता मंदिर में महामाया और महालया माता की पूजा की जाएगी। इस परंपरा के अंतर्गत कलेक्टर द्वारा माता को मदिरा का भोग अर्पित किया जाएगा। नगर पूजा उज्जैन की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में शामिल है और हर वर्ष नवरात्रि के दौरान इसका आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर धार्मिक विधि-विधान के साथ पूजा संपन्न कराई जाएगी।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस नवरात्रि में दो सर्वार्थ सिद्धि योग और दो रवि योग भी बन रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं में इन योगों को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। इसी आधार पर साधना और उपासना के साथ भूमि या भवन की खरीदारी तथा वाहन और संपत्ति से जुड़े कार्य करने की भी मान्यता है। हालांकि किसी भी महत्वपूर्ण खरीदारी या शुभ कार्य के लिए संबंधित तिथि और स्थानीय पंचांग का ध्यान रखना उचित माना जाता है।
महाष्टमी पर पूजा करने वालों के लिए समय का विशेष महत्व है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार रात्रि पूजन की परंपरा निभाने वाले श्रद्धालु 18 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे से शाम 5 बजे के बीच पारंपरिक पूजा कर सकते हैं। वहीं सुबह पूजा करने वाले परिवारों को 19 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 30 मिनट से पहले पूजन संपन्न करने की सलाह दी गई है। अलग-अलग पंचांगों में अष्टमी तिथि को लेकर गणना का अंतर भी बताया गया है। अष्टगामी ग्रह लाघवी पद्धति में अष्टमी 18 अक्टूबर को 60 घटी की मानी गई है जबकि चित्रा केतकी पंचांग में इसे 19 अक्टूबर को बताया गया है।
कन्या पूजन और कन्या भोज के लिए भी 19 अक्टूबर को विशेष समय बताया गया है। अष्टमी तिथि के दौरान सूर्योदय से सुबह 10 बजकर 51 मिनट तक कन्या पूजन और भोज कराया जा सकता है। यदि किसी कारणवश श्रद्धालु इस अवधि में पूजा नहीं कर पाते हैं तो दोपहर 11 बजकर 43 मिनट से 12 बजकर 30 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त में भी कन्या पूजन और भोज करा सकते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार अभिजीत मुहूर्त को शुभ और सिद्धिदायक माना जाता है इसलिए इस अवधि में भी पूजा करना उचित बताया गया है।
महाष्टमी के अवसर पर देवी दुर्गा की आराधना के साथ कन्या पूजन और भोज को विशेष महत्व दिया जाता है। श्रद्धालु छोटी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं और भोजन कराकर आशीर्वाद लेते हैं। नवरात्रि के इन अंतिम दिनों में मंदिरों और घरों में पूजा-पाठ का सिलसिला जारी है। श्रद्धालुओं को सलाह है कि वे अपने क्षेत्र के पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजन करें।
