दरअसल इंटरकनेक्शन वह तकनीकी और परिचालन व्यवस्था है जिसके माध्यम से दो या अधिक दूरसंचार नेटवर्क एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इसी व्यवस्था के जरिए अलग-अलग कंपनियों के मोबाइल और टेलीफोन उपयोगकर्ता आपस में बातचीत कर पाते हैं। अभी तक कई इंटरकनेक्शन व्यवस्थाएं लॉन्ग डिस्टेंस चार्जिंग एरिया यानी एलडीसीए और शॉर्ट डिस्टेंस चार्जिंग एरिया यानी एसडीसीए स्तर पर संचालित होती रही हैं। ट्राई के नए संशोधन का उद्देश्य इस व्यवस्था को लाइसेंस प्राप्त सेवा क्षेत्र यानी एलएसए स्तर पर स्थानांतरित करना है।
नए नियमों के अनुसार मौजूदा एलडीसीए और एसडीसीए स्तर के पॉइंट्स ऑफ इंटरकनेक्शन यानी पीओआई पर दर्ज ट्रैफिक को अगले तीन वर्षों में चरणबद्ध तरीके से एलएसए स्तर के पीओआई पर स्थानांतरित किया जाएगा। इसके बाद दूरसंचार ट्रैफिक का आदान-प्रदान सेवा क्षेत्र स्तर पर ही होगा। ट्राई के मुताबिक इससे कॉल रूटिंग की प्रक्रिया सरल होगी और सीमित नंबरिंग संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकेगा। साथ ही कम लेटेंसी और बेहतर सेवा विश्वसनीयता जैसे फायदे भी मिल सकते हैं।
इन संशोधनों का एक अहम हिस्सा आईपी आधारित इंटरकनेक्शन को बढ़ावा देना है। नियम लागू होने के बाद स्थापित होने वाले सभी नए इंटरकनेक्शन आईपी आधारित होंगे। वहीं मौजूदा ई1 और टीडीएम तकनीक पर काम कर रहे पीओआई को भी तीन वर्षों के भीतर चरणबद्ध तरीके से आईपी आधारित व्यवस्था में बदला जाएगा। इस तकनीक से बैंडविड्थ का अधिक कुशल इस्तेमाल संभव होगा। इसके साथ कॉल की गुणवत्ता और शुरुआत से अंत तक कॉल प्रदर्शन बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
ट्राई ने आईपी आधारित इंटरकनेक्शन की क्षमता तय करने के लिए भी प्रावधान किए हैं। इसके तहत यह देखा जाएगा कि कोई पीओआई एक समय में कितने सेशन संभाल सकता है और लिंक की बैंडविड्थ कितनी है। सेवा प्रदाताओं को निर्धारित सेवा गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी होगा। इसके अलावा पीओआई को स्वेच्छा से सरेंडर करने के लिए अलग नियामकीय व्यवस्था बनाई गई है। इससे कंपनियां ट्रैफिक में कमी या किसी क्षेत्र से सेवाएं वापस लेने जैसी परिस्थितियों में अपनी जरूरत के अनुसार पीओआई सरेंडर कर सकेंगी।
बैंक गारंटी व्यवस्था को पहले की तरह बरकरार रखा गया है लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। पुनर्मूल्यांकन के आधार पर जमा की जाने वाली बैंक गारंटी की वैधता और पुनर्मूल्यांकन के बीच की अवधि छह महीने से बढ़ाकर 12 महीने कर दी गई है। इसके साथ ही आईपी आधारित इंटरकनेक्शन सहित पीओआई के लिए बैंक गारंटी की अधिकतम सीमा तय करने की संशोधित पद्धति भी शामिल की गई है।
इंटरकनेक्शन शुल्क के भुगतान में देरी को लेकर भी नए नियम बनाए गए हैं। अब विलंबित भुगतान पर ब्याज दर सेवा प्रदाताओं की आपसी सहमति से तय होगी। हालांकि इसकी अधिकतम सीमा भारतीय स्टेट बैंक की एक वर्षीय एमसीएलआर से दो प्रतिशत अधिक निर्धारित की गई है। नियमों के पालन की निगरानी के लिए रिपोर्टिंग व्यवस्था भी बनाई गई है। एलडीसीए और एसडीसीए से एलएसए स्तर पर ट्रैफिक स्थानांतरित करने तथा पुरानी तकनीक से आईपी आधारित इंटरकनेक्शन में बदलाव की प्रगति पर नजर रखी जाएगी।
नए प्रावधानों के उल्लंघन पर चरणबद्ध वित्तीय दंड का ढांचा भी तय किया गया है। ट्राई का मानना है कि इन बदलावों से दूरसंचार कंपनियों के बीच नेटवर्क कनेक्टिविटी अधिक व्यवस्थित होगी और नियामकीय नियमों का पालन बेहतर तरीके से सुनिश्चित किया जा सकेगा। हालांकि इन बदलावों का पूरा प्रभाव चरणबद्ध क्रियान्वयन के बाद सामने आएगा।
