युगल किशोर शर्मा
✦ विशेष लेख ✦
भारत का ग्रामीण परिदृश्य आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। एक ओर विकास की रफ्तार है, तो दूसरी ओर नशाखोरी, घरेलू हिंसा, महिला असुरक्षा और छोटे अपराधों की बढ़ती छाया। ऐसे समय में यदि कोई गांव इन सभी समस्याओं से परे खड़ा दिखाई दे, तो वह केवल खबर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन जाता है।
मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की करैरा तहसील में स्थित ग्राम मतवारी ऐसा ही एक गांव है—जहाँ समाज ने स्वयं को इतना अनुशासित कर लिया है कि कानून और पुलिस की आवश्यकता लगभग अप्रासंगिक हो गई है।
लगभग 883 की आबादी वाला यह छोटा-सा गांव आज भी पूरी तरह व्यसन-मुक्त, मांसाहार-मुक्त और अपराध-मुक्त है। यह उपलब्धि किसी सरकारी अभियान, कड़े कानून या प्रशासनिक दबाव से नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक चेतना और सामूहिक नैतिक अनुशासन से संभव हुई है।
पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली
गांव के 80 वर्षीय बुजुर्ग किशनलाल कुशवाह बताते हैं कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में न तो किसी को शराब पीते देखा और न ही मांस सेवन की कोई परंपरा सुनी।
उनकी बात केवल स्मृति नहीं, बल्कि इस तथ्य का प्रमाण है कि ग्राम मतवारी की सामाजिक संरचना कम से कम तीन पीढ़ियों से बिना टूटे चली आ रही है। आज के समय में, जब पीढ़ीगत मूल्य तेजी से बदल रहे हैं, यह निरंतरता अपने आप में असाधारण है।
परंपरा से संचालित सामाजिक नियंत्रण
ग्राम मतवारी में कोई लिखित सामाजिक संहिता नहीं है, फिर भी अनुशासन अटूट है।
ग्रामीण मानते हैं कि यदि कोई व्यक्ति गांव की मर्यादा का उल्लंघन करता है, तो उसे पंचायत और समाज के सम्मुख उत्तरदायी होना पड़ता है। कई बार इसे दैवी चेतावनी से भी जोड़ा जाता है। इसके बाद सार्वजनिक रूप से गलती स्वीकार कर भविष्य में सुधार का संकल्प लिया जाता है।
यह व्यवस्था आधुनिक दंडात्मक कानून की तरह भय पर नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित है—और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
महिलाओं के लिए भयमुक्त संसार
व्यसन-मुक्त समाज का सबसे सकारात्मक प्रभाव गांव की महिलाओं के जीवन में दिखाई देता है।
गांव की महिला लीलावती पाल, जिनकी शादी को 22 वर्ष हो चुके हैं, कहती हैं कि उन्होंने कभी घरेलू हिंसा या सामाजिक असुरक्षा का अनुभव नहीं किया।
देश के अनेक हिस्सों में महिला सुरक्षा आज भी एक जटिल प्रशासनिक चुनौती है, जबकि ग्राम मतवारी यह सहजता से सिद्ध करता है कि नशा-मुक्ति ही महिला सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी है।
अपराध, जो कभी पैदा ही नहीं हुआ
ग्राम मतवारी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां अपराध की चर्चा तक नहीं होती।
छोटे-मोटे विवाद पंचायत और आपसी संवाद से सुलझा लिए जाते हैं।
इस तथ्य की पुष्टि करते हुए करैरा पुलिस थाना प्रभारी विनोद सिंह छावई बताते हैं कि मतवारी गांव से संबंधित किसी भी व्यक्ति का कोई आपराधिक रिकॉर्ड दर्ज नहीं है।
प्रशासनिक दृष्टि से यह गांव एक “Zero Crime Social Unit” का दुर्लभ उदाहरण है।
भारत के लिए एक गहरा संकेत
ग्राम मतवारी यह सवाल खड़ा करता है कि क्या भारत का भविष्य केवल कानून, निगरानी और दंड में छिपा है—या फिर समाज की आंतरिक चेतना में?
यह गांव बताता है कि जब समुदाय स्वयं नियमों का पालनकर्ता और संरक्षक बन जाता है, तब शासन अधिक मानवीय, कम खर्चीला और अधिक प्रभावी हो जाता है।
आज जब भारत “विकसित राष्ट्र” बनने की ओर अग्रसर है, तब ग्राम मतवारी यह याद दिलाता है कि—
विकास केवल सड़कों, इमारतों और आंकड़ों से नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कृति और सामूहिक जिम्मेदारी से बनता है।
एक गांव, जो राष्ट्र को दिशा दिखा सकता है
नशा-मुक्ति, महिला सुरक्षा और अपराध नियंत्रण जैसे मुद्दों पर ग्राम मतवारी केवल प्रेरक कहानी नहीं, बल्कि नीति-निर्माण के लिए एक जीवंत प्रयोग है।
यह गांव बताता है कि यदि समाज चाहे, तो वह स्वयं कानून बन सकता है, स्वयं प्रहरी बन सकता है—बिना हिंसा, बिना भय और बिना दमन के।
ग्राम मतवारी आज सिर्फ मध्यप्रदेश का नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक आत्मा का प्रतिनिधि बन चुका है।
