डॉ. मयंक चतुर्वेदी
देश में एक बार फिर वेतन आयोग की चर्चा है। केंद्र सरकार आठवां वेतन आयोग लाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। करीब 1.1 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को उम्मीद है कि इस आयोग के लागू होने के बाद उनकी सैलरी और पेंशन में अच्छी-खासी बढ़ोतरी होगी। महंगाई भत्ता और महंगाई राहत को नए सिरे से तय किया जाएगा, वेतन संरचना बदलेगी और सरकारी खजाने पर लगभग 2.4 लाख करोड़ से 3.2 लाख करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त बोझ भी आएगा, लेकिन तर्क यह दिया जाता है कि इससे सरकारी कर्मचारियों की क्रय शक्ति बढ़ेगी, उनके हाथ में अधिक पैसा आएगा, बाजार में मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।
अब सवाल यह है कि क्या भारत केवल केंद्रीय कर्मचारियों का देश है? क्या इस देश की अर्थव्यवस्था में केवल वही लोग शामिल हैं जो केंद्र सरकार की नौकरी करते हैं? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की कार्यशील आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र, छोटे उद्योगों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, सेवा क्षेत्र और राज्य सरकारों के अधीन काम करता है। उनकी संख्या केंद्रीय कर्मचारियों से कई गुना अधिक है। वे भी उसी बाजार से राशन खरीदते हैं, वही पेट्रोल भरवाते हैं, वही बच्चों की फीस भरते हैं और वही महंगाई का बोझ झेलते हैं। फिर उनके लिए कोई वेतन आयोग क्यों नहीं?
भारत में जब भी वेतन आयोग की चर्चा होती है, उसका केंद्र लगभग 1.1 करोड़ केंद्रीय कर्मचारी और पेंशनभोगी ही होते हैं। उनके वेतन और भत्तों में वृद्धि के लिए सरकार आयोग बनाती है, विस्तृत अध्ययन होते हैं और हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाता है। लेकिन इसी देश में करोड़ों निजी कर्मचारियों की स्थिति पर शायद ही कभी उतनी गंभीरता से विचार होता है। यही वह असमानता है जो आज के आर्थिक ढांचे पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
यदि आंकड़ों की बात करें तो कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के अनुसार भारत में लगभग 28 लाख कंपनियाँ पंजीकृत हैं, जिनमें से करीब 65 प्रतिशत कंपनियाँ सक्रिय हैं। अर्थात लगभग 18 से 18.5 लाख कंपनियाँ वास्तव में काम कर रही हैं। इन कंपनियों में लगभग 95 से 96 प्रतिशत निजी स्वामित्व वाली हैं। इसका अर्थ यह है कि देश की अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के कंधों पर टिका हुआ है। यहां ध्यान रहे कि यह आंकड़ा केवल कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत कंपनियों का है। यदि इसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई), छोटे व्यापारिक प्रतिष्ठान, दुकानें, सेवा क्षेत्र की इकाइयाँ और स्वरोजगार गतिविधियाँ जोड़ दी जाएँ तो निजी क्षेत्र की इकाइयों की संख्या कई करोड़ तक पहुँच जाती है। यही वह क्षेत्र है जो देश में रोजगार का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।
भारत में एमएसएमई क्षेत्र की लगभग 6.3 करोड़ इकाइयाँ काम कर रही हैं और इन्हीं के माध्यम से लगभग 29 से 31 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। यानी जिस देश में एक ओर लगभग एक करोड़ केंद्रीय कर्मचारी हैं, वहीं दूसरी ओर तीस करोड़ से अधिक लोग निजी और छोटे-मध्यम उद्योगों के माध्यम से अपनी आजीविका चला रहे हैं। यदि व्यापक दृष्टि से देखें तो भारत में कुल रोजगार का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा निजी क्षेत्र से आता है। देश की कुल कार्यरत आबादी लगभग 46 से 47 करोड़ मानी जाती है, जिनमें से लगभग 35 से 40 करोड़ लोग सीधे या परोक्ष रूप से निजी क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत में रोजगार का सबसे बड़ा आधार निजी क्षेत्र है। इसके बावजूद वेतन, सामाजिक सुरक्षा और महंगाई से राहत जैसी नीतियों पर चर्चा करते समय यह विशाल वर्ग अक्सर नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं से बाहर दिखाई देता है। हर बार जब कोई नया वेतन आयोग आता है, सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ जाती है। उनका महंगाई भत्ता बढ़ता है, भत्ते बढ़ते हैं, पेंशन मजबूत होती है और उनकी आर्थिक स्थिति पहले से अधिक सुरक्षित हो जाती है।
वैसे यह सब होना गलत नहीं है। सरकारी कर्मचारियों को भी सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। पर समस्या तब पैदा होती है जब सरकारी नीतियों में बाकी कामकाजी भारत का जिक्र ही नहीं होता। निजी क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति पर शायद ही कभी राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा होती है। एक निजी कंपनी में काम करने वाला कर्मचारी अक्सर दस-दस घंटे काम करता है, लेकिन उसकी सैलरी सालों तक नहीं बढ़ती। कई बार उसे न्यूनतम वेतन से थोड़ा ही अधिक मिलता है। महंगाई चाहे जितनी बढ़ जाए, उसके वेतन में उसी अनुपात में वृद्धि की कोई गारंटी नहीं होती।
कई कर्मचारी बीस-बीस साल तक किसी कंपनी को खड़ा करने में अपना जीवन लगा देते हैं। कंपनी के संघर्ष के दिनों में उनसे कहा जाता है कि “आप ही इस संस्थान की ताकत हैं।” किंतु जैसे ही कंपनी मजबूत होती है, वही कर्मचारी अचानक बोझ बन जाते हैं और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है या दिखाने का प्रयास एवं डर अक्सर उन्हें दिखाया जाता है! न्याय पाने के लिए अदालत जाना भी उनके लिए आसान नहीं होता, क्योंकि रोजमर्रा के संघर्ष के बीच लंबी कानूनी लड़ाई लड़ना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
राज्य सरकारों के कर्मचारियों की स्थिति भी कई जगह असमान है। कई राज्यों में वेतन संरचना केंद्र के बराबर नहीं है, महंगाई भत्ता समय पर नहीं मिलता और पेंशन व्यवस्था भी कमजोर है। जब बाजार में सबके लिए कीमतें समान हैं, तो राहत केवल कुछ लाख कर्मचारियों तक ही क्यों सीमित हो? महंगाई यह नहीं देखती कि सामने खड़ा व्यक्ति केंद्रीय कर्मचारी है, निजी कर्मचारी है या दिहाड़ी मजदूर। पेट्रोल, गैस, राशन, दवाइयाँ और शिक्षा की कीमतें सबके लिए समान हैं। फिर आर्थिक राहत की व्यवस्था अलग-अलग क्यों?
सरकार चाहे तो इस स्थिति को बदल सकती है। जिस तरह न्यूनतम वेतन कानून बनाया गया, उसी तरह एक ऐसी राष्ट्रीय व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन की भी समय-समय पर समीक्षा अनिवार्य हो। महंगाई के अनुसार वेतन संशोधन का एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया जा सकता है। साथ ही एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी है। आज भी देश के बहुत से निजी कर्मचारियों के पास भविष्य निधि, पेंशन या स्वास्थ्य सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं। वे पूरी जिंदगी काम करते हैं, लेकिन बुढ़ापे में उनके पास कोई ठोस सहारा नहीं होता।
जब सरकार केंद्रीय कर्मचारियों के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान कर सकती है, तो क्या वह बाकी कामकाजी वर्ग के लिए कोई व्यापक नीति नहीं बना सकती? क्या ऐसी व्यवस्था नहीं बन सकती जिसमें हर नौकरी करने वाला व्यक्ति कम से कम इतना कमा सके कि वह अपने परिवार की बुनियादी जरूरतें सम्मान के साथ पूरी कर सके?
आठवां वेतन आयोग आना अच्छी बात है, लेकिन यह अधूरी खुशी है। असली खुशी तब होगी जब सरकार यह सोचेगी कि इस देश का हर कर्मचारी चाहे वह सरकारी हो, निजी हो या किसी छोटे संस्थान में काम करता हो महंगाई के सामने असहाय न रहे। अब सवाल यही है कि क्या वेतन आयोग की खुशियाँ हर बार की तरह केवल कुछ लोगों तक सीमित रहेंगी, या फिर सरकार पूरे कामकाजी भारत के लिए आर्थिक सुरक्षा का व्यापक रास्ता भी तैयार करेगी? यही प्रश्न आज के भारत की आर्थिक और सामाजिक न्याय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। जिसका समाधान अब नहीं तो कब! आखिर होना ही चाहिए।
