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संघर्षों ने ले ली है सौगंध अगर,
कभी कहीं भी साथ नहीं ये छोड़ेंगे,
डटे हुए हैं हम भी घातों-प्रतिघातों में,
देखें कैसे फौलादी हिम्मत तोड़ेंगे।
परख रहे षड़यंत्र हमेशा शैतानी,
पकड़ में आये कहीं कोई तो नादानी,
कहीं कोई सूराख एक तो मिल जाये ,
हम उतार कर रख देंगे सारा पानी।
या तो जिंदगी में आंसू ही भर देंगे,
या फिर तन से पूरे प्राण निचोड़ेंगे।
पता नहीं कितने चैहरे हैं दैत्यों के,
बार-बार वे नए मुखोटों में आते हैं,
कहां कहां से नहीं आक्रमण करते हैं,
देख भयानक रूप देवता घबराते हैं
कई छलावे सीख रखें हैं दुष्टों ने,
प्रीत जता कर कितने धोके जोड़ेंगे।
कभी धूप में प्यास कठिन बन जाते हैं,
मृगतृष्णा बन अपने पास बुलाते हैं,
कभी मेघ बन इतना जल बरसाते हैं,
बन कर बाढ़ बहा कहीं ले जाते हैं,
कभी रास्ते बर्फीले कर देते हैं
देखें इसके पांव कहां तक दौड़ेंगे।
सोच लिया है मरते दम तक लड़ना है,
नहीं कभी भी कोई समझोता करना है,
जिन राहों पर चलने में मन साथ न दे,
उन राहों पर कदम एक ना धरना है,
मरते हैं तो भले युद्ध में मर जायें,
कदम एक भी इधर-उधर न मोड़ेंगे।
अरुण अपेक्षित
12 फरवरी 2026
इन्दौर म.प्र.
