लघुकथा…
अपने अपने धंधे
**********सेठ महावीर प्रसाद जी की कपड़े की दुकान सड़क के इस तरफ थी और चाय की स्टाल सड़क के उस तरफ, सड़क के बीचोबीच एक डिवाइडर था यदि सड़क के उस तरफ से इस तरफ आना है तो थोड़ा आगे चलकर जहाँ कट था वहीं से आ पाते थे वैसे दिखने में आमने सामने थी चाय की स्टाल और सेठ जी की कपड़े की दुकान।
शाम को जब सेठ जी दुकान बंद कर घर जाते तो चाय की दुकान पर कुछ देर बैठते बातें करते और चाय पीते थे।
आज सेठ जी ने दुकान खोली कुछ देर ही बैठ पाये थे कि दुकान के सामने एक लग्जरी कार रुकी, कार से दो साधू उतरे…मलंग, बड़ी लम्बी दाढ़ी, लम्बी लम्बी जटायें, बहुत आकर्षक चेहरे, माथे पर तिलक, गले में बड़ी बड़ी रुद्राक्ष की मालायें…
सेठ जी ने गद्दी से प्रणाम किया…
आयुष्मान भव…
क्या हालचाल हैं महावीर सेठ….
सेठ जी अपने नाम को सुनकर भौचक्के रह गए…
महाराज जी मैंने पहचाना नहीं…
क्या करेगा बच्चा पहचान कर…
हम तो रमते जोगी हैं…
हमें लोभ है न लालच है न डर है,
सारी धरती हमारी है
जहाँ ठहर गये वहीं हमारा घर है ।
ले बच्चा इस ताबीज को अपने बडे़ बेटे रमेश के बच्चे बबलू को पहना देना उसकी तबियत जल्दी ही ठीक हो जायेगी ।
अब तो सेठ जी ने पैर पकड़ लिए महाराज जी के…
महाराज आप तो अंतरयामी हो सब जानते हो….
तेरा बेटा मास्टर है उसका ट्रांसफर रुक नहीं पा रहा है… ले इस भभूति की पुड़िया उसकी जेब में रख देना जहाँ चाहेगा वहीं नौकरी करेगा ।
सेठ जी ने पैर छूकर भभूति की पुड़िया ले ली ।
दोनों साधू उठकर जाने लगे तो सेठ जी ने चाय पानी की जिद की…
चल जल्दी मंगवाकर चाय पिला ध्यान रखना चाय स्टील के गिलास में हो…
जी महाराज जी…..
जैसे ही चाय आई महाराज जी ने आंखों को बंद करके ऊपर की ओर हाथ घुमाया तो उनके हाथ में एक ताबीज और आ गई….
सभी आश्चर्य चकित देखते रह गये….
महाराज जी ने आंखें खोलते हुए कहा… अरुण के नाम की ताबीज आई है…
कौन है अरुण…?
कौन है अरुण…?
सेठ जी तो अब बिलकुल पानी पानी हो गये.. हाथ जोड़कर बोले महाराज जी मेरा दूसरा बेटा है .. रमेश बड़ा बेटा है महाराज जी….
अरुण जिस कंपनी में जाब है उसका प्रमोशन होने वाला है दो गुणा पैकैज हो जायेगा यह ताबीज उसके पास भेज दे…..
जी महाराज जी…..
तेरे घर में तेरी पत्नी साक्षात लक्ष्मी है लक्ष्मी……
फिर आंखें बंद कर बोले… श. श.श.श.श. शारदा नाम है….
जय हो महाराज की… अब तक सेठ जी महाराज के भक्त बन चुके थे…
बस बच्चा अब हम प्रस्थान करेंगे।
जैसे ही साधु उठे तो सेठ हाथ जोड़ कर बोले … महाराज जी कुछ दक्षिणा…..
नहीं नहीं बच्चा हम दक्षिणा नहीं लेते…
सेठ जी गिड़गड़ाने लगे….
चल महाकाल पर ज्योति जलायेंगे तेरे नाम की… एक कनस्तर देशी घी दे…..
सेठ जी बगल की दुकान पर घी लेने जाने लगे तो महाराज जी ने रोक दिया…
अरे बच्चा घी तो हम वहीं खरीद लेंगे पैसे हमारे चेले को दे दो…
एक कनस्तर घी की रेट मालूम करके ग्यारह हज़ार रुपये देकर अपने आपको धन्य महसूस कर रहे थे सेठ जी…. ।
पूरे दिन बडे़ खुश…चलो शाम को घर सुनायेंगे आज के चमत्कार की बातें…
सचमुच धरती पर कितनी शक्तियां भरी पड़ी हैं सोच रहे थे …सेठ जी बैठे बैठे….
दुकान बंद कर सामने चाय की दुकान पर रुक गये चाय पीने…
बैठते ही सेठ जी आज के चमत्कार की चर्चा करने लगे…
चाय वाले पंडित जी ने बीच में ही टोका… क्या कार से आये थे दो साधू….
सेठ जी बोले… हाँ.. पर तुम्हें कैसे पता…
हमारे यहाँ चाय पीने आये थे…
आपकी दुकान की तरफ इशारा करते हुए हमसे आपका नाम पूछा था…
कितने बच्चे हैं…
बच्चों के नाम पूंछे थे..
कोई नाती है
हमने रमेश के बच्चे का नाम बताया था… तबियत खराब है यह भी बताया था….
पर सेठ जी आप चुप क्यों हो गये…
बताओ.. बताओ…
क्या चमत्कार हुआ सेठ जी…
सचमुच धरती पर बहुत बड़ी बड़ी शक्तियां पडी़ हैं.. कहते हुए सेठ जी ने अपना थैला उठाया और घर की ओर चल दिए ।
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सतीश श्रीवास्तव
मुंशी प्रेमचंद कालोनी करैरा,जिला शिवपुरी(मध्यप्रदेश)
