जीरामजी से जागरण तक
सुबह-सुबह आंगन में दूध की बाल्टी रखकर सुखलाल कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा रहा था। चेहरे पर ऐसी चमक मानो बोनस मिल गया हो।
मैंने पूछा, “क्यों रे सुखलाल, आज बड़े प्रसन्न दिख रहे हो?”
सुखलाल बोला, “अरे पत्रकार साहब, मोदी जी ने बड़ा अच्छा कर दओ।”
मैं चौंका, “अब क्या नया कर दिया?”
सुखलाल ने मुस्कुरा कर कहा, “आप ठहरे पत्रकार, आपको तो सब पता ही होगा। कल तक जो मनरेगा-मनरेगा चिल्लाते थे, अब कम से कम जीरामजी तो कहेंगे।”
मैं हंसा, “अरे, नाम बदलने पर बवाल मचा है। कांग्रेस कह रही है कि महात्मा गांधी का नाम हटा दिया गया।”
सुखलाल ने माथा खुजाया, “भैया, सच्ची बताऊं? आज तक आपने किसी को पूरा नाम बोलते सुना है, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम?”
मैंने सोचा और बोला, “नहीं, सब मनरेगा ही कहते हैं।”
तो बस! सुखलाल उत्साह में बोला, “जब गांधी बाबा का नाम कोई ले ही नहीं रहा था, तब हटाने का रोना कैसा? अब जीरामजी बोलेंगे, तो कम से कम राम नाम तो जुड़ जाएगा।”
मैंने चुटकी ली, “तुम्हें लगता है योजना का नाम बदलने से कुछ बदल जाएगा?”
सुखलाल हंस पड़ा, “भैया, नाम में ही तो ताकत होती है। बच्चा भी पहले नाम से ही पहचाना जाता है और फिर राम नाम तो खुद में पूरा दर्शन है। मुक्ति भी देता है और दिशा भी।”
मैंने कहा, “पर राजनीति…?”
“राजनीति तो आप जानो,” सुखलाल बोला- “हम आम आदमी हैं। हमें तो इतना दिखता है कि राम नाम में भरोसा है। गांधी बाबा भी तो राम-राम करते थे। उनके आखिरी शब्द क्या थे- हे राम! अब बताओ, अगर गांधी जी खुद राम का नाम लेते थे, तो राम को योजना के नाम में लाने में बुराई कैसी?”
मैं चुप हो गया।
सुखलाल आगे बोला, “मोदी जी ने पहले अयोध्या में मंदिर बनवाया। बरसों की तपस्या पूरी हुई। अब जीरामजी योजना के बहाने हर गांव, हर मजदूर, हर घर में राम का नाम मुंह पर आएगा। इससे अच्छा ओर क्या होगा?”
मैंने कहा, “यानि रोजगार के साथ-साथ मोक्ष भी?”
सुखलाल खिलखिला उठा, “अरे भैया, कोशिश तो यही है। पेट भी भरे और आत्मा भी।”
मैंने पूछा, “लेकिन विरोध करने वालों का कहना है कि यह इतिहास मिटाने की कोशिश है।”
सुखलाल ने गंभीर होकर कहा, “इतिहास तब मिटता है जब लोग भूल जाएं। गांधी जी को कौन भूल सकता है? पर सच तो ये है कि आम आदमी ने इस योजना को गांधी जी से जोड़कर कभी देखा ही नहीं। उसके लिए तो ये बस मनरेगा थी, काम मिले या न मिले, नाम बस मनरेगा।”
वह थोड़ी देर रुका, फिर बोला, अब जीरामजी नाम सुनकर आदमी सोचेगा राम कौन हैं, क्यों हैं। मतलब नाम सोचने पर मजबूर करेगा। आज के समय में सोचने पर मजबूर करना भी बड़ी सेवा है।
मैंने महसूस किया कि उसकी बातों में सहज तर्क ज्यादा है।
सुखलाल बोला, “भैया, ये देश राम का देश है। जिन्होंने सत्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। यही तो गांधी जी भी कहते थे, सत्य और राम एक ही हैं। अब अगर योजना का नाम जीरामजी हो गया, तो इसमें गांधी जी का अपमान कहां?”
मैंने कहा, “तुम्हारी बातें सुनकर लगता है कि आम आदमी इस फैसले को अधिक सहजता से ले रहा है।”
सुखलाल मुस्कुराया, “क्योंकि आम आदमी नाम नहीं, भावना देखता है और भावना ये है कि सरकार हमारी आस्था को भी पहचान रही है। हमें सिर्फ मजदूर नहीं, सांस्कृतिक भी मान रही है।”
दूध की बाल्टी उठाते हुए वह बोला, “अब देखना भैया, कल से गांव में कोई कहेगा ‘जीरामजी का काम मिला?’ तो राम-राम अपने आप निकल जाएगा। यही तो असली लाभ है।”
सुखलाल चला गया और मैं सोचता रह गया! शायद यही फर्क है दिल्ली की बहस और गांव की समझ में। जहां नाम बदलना राजनीति है, वहीं आम आदमी के लिए वह पहचान, आस्था और अपनापन है।
जीरामजी शायद सिर्फ एक योजना नहीं है, यह याद दिलाने का एक तरीका है कि यह देश सिर्फ योजनाओं से नहीं चलता है, इसके कण-कण में राम नाम का स्मरण है। राम ही सत्य हैं, सनातन है, मोक्ष का आधार है और राम तत्व ही इस भारत के प्राण हैं।
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
