ऋतिक ने बताया कि ऐसी स्थिति में हम अपने दिमाग से उस उदासी के कारण ढूंढने लगते हैं। हम तर्क गढ़ते हैं-थ्योरी बनाते हैं-समाधान सोचते हैं-लेकिन फिर भी उस बेवजह की उदासी से बाहर नहीं निकल पाते। यह भावना बिना किसी चेतावनी के हमें अपनी गिरफ्त में ले लेती है और पूरा दिन भारी लगने लगता है।अपने पोस्ट में अभिनेता ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि वह भी उसी वक्त अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल रहे थे। उन्होंने लिखा कि कैसे हम बड़े-बड़े शब्दों के जरिए अपनी उदासी को खूबसूरत या तार्किक बनाने की कोशिश करते हैं। ऋतिक ने इस प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया कि आज की दुनिया में कैसे बेमतलब चीजों को भी इस तरह पेश किया जाता है कि वे जरूरी और समझदारी भरी लगने लगती हैं।
इसके बाद ऋतिक ने विज्ञान का हवाला देते हुए एक अहम बात साझा की। उन्होंने न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जिल बोल्टे टेलर का जिक्र करते हुए लिखा कि कोई भी भावना अपने शुद्ध रूप में सिर्फ 90 सेकंड तक ही रहती है। अगर हम उस भावना को बार-बार सोचकर जिंदा न रखें-तो वह या तो बदल जाती है या किसी दूसरी भावना में मिल जाती है। यानी-अगर हम खुद को 90 सेकंड तक संभाल लें-तो उदासी अपने आप कमजोर पड़ने लगती है।
ऋतिक ने मजाकिया अंदाज में लिखा-इस पोस्ट को लिखने में मुझे 45 सेकंड लगे हैं-45 सेकंड अभी बाकी हैं। पोस्ट के अंत में उन्होंने उन लोगों को टैग किया जो शायद इस पोस्ट को समझ न पाएं या इसे पढ़कर नाराज हो जाएं। उन्होंने लिखा कि ऐसे लोग असल में जिंदगी को सही मायनों में जी रहे हैं।ऋतिक रोशन की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और फैंस इसे मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक ईमानदार और जरूरी संदेश बता रहे हैं।
