निजी हाथों में कमान और शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल उल्लेखनीय है कि सरकार ने पिछले वर्ष मिट्टी परीक्षण की जिम्मेदारी निजी लैबों को सौंप दी थी। इसका उद्देश्य किसानों को उनके खेत की मिट्टी की गुणवत्ता की सटीक जानकारी देना था, ताकि वे सही उर्वरकों का उपयोग कर सकें। लेकिन निजी लैब संचालकों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया। उन्होंने न तो खेत देखे और न ही मिट्टी के नमूने लिए, बल्कि दफ्तरों में बैठकर ही किसान, खेत और फसलों का फर्जी रिकॉर्ड तैयार कर लिया।
हजारों किलोमीटर दूर के किसानों का मुरैना में ‘परीक्षण’ जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे सरकारी सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी हैं। मुरैना की इन लैबों ने तीन हजार से अधिक ऐसे किसानों के सॉइल हेल्थ कार्ड जारी किए हैं, जिनका वजूद ही जिले में नहीं है। इनमें मध्य प्रदेश के अन्य जिलों जैसे शहडोल और नागदा के अलावा छत्तीसगढ़ के भिलाई और दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना तक के फर्जी नाम शामिल हैं। सवाल यह उठता है कि हजारों किलोमीटर दूर के खेतों की मिट्टी परीक्षण के लिए मुरैना कैसे पहुँची और अधिकारियों ने बिना भौतिक सत्यापन के भुगतान की फाइलें कैसे आगे बढ़ा दीं?
कृषि विभाग और लैब संचालकों की मिलीभगत यह पूरा फर्जीवाड़ा कृषि विभाग के अधिकारियों और निजी लैब संचालकों की गहरी मिलीभगत का नतीजा माना जा रहा है। सरकार प्रति सॉइल हेल्थ कार्ड लैब को एक निश्चित राशि का भुगतान करती है। इसी राशि को डकारने के लिए कागजों पर फर्जी किसानों की फौज खड़ी कर दी गई। कृषि मंत्री के गृह जिले में ही इस तरह का खेल होने से विभाग में हड़कंप मच गया है। अब देखना यह है कि इस हाई-प्रोफाइल मामले में सरकार क्या कार्रवाई करती है। क्या केवल छोटी मछलियों पर गाज गिरेगी या इस सिंडिकेट को चलाने वाले बड़े अधिकारियों पर भी शिकंजा कसा जाएगा? इस खुलासे के बाद अब पूरे प्रदेश में संचालित निजी लैबों की जांच की मांग उठने लगी है।
