सौभाग्य रहा कि आग और धुआं अस्पताल की मुख्य इमारतों तक नहीं पहुँचा, वरना बड़ा हादसा हो सकता था। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आग लगते समय शीशियों के टूटने और पटाखों जैसी आवाजों से अंदाजा लगाया जा रहा था कि सामान्य कचरे के साथ बायोमेडिकल वेस्ट भी वहां मिला हुआ था।
विशेषज्ञों का कहना है कि बायोमेडिकल वेस्ट को अलग रंग के बैग (पीला, लाल, सफेद, नीला) में संग्रहित करना और अधिकृत एजेंसी के माध्यम से ही नष्ट करना जरूरी है। खुले में पड़ा संक्रमित कचरा संक्रमण फैलाने का बड़ा खतरा बन सकता है, खासकर अस्पताल जैसे संवेदनशील परिसर में जहां रोजाना हजारों मरीज और परिजन आते हैं।
डीन डॉ. नवनीत सक्सेना ने आग को गंभीर मामले के रूप में लिया और सभी संबंधित अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जिन कर्मचारियों की लापरवाही से कचरा खुले में पड़ा रहा, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। साथ ही मेडिकल अधीक्षक को कहा गया कि भविष्य में बायोमेडिकल कचरे का निपटान नियमों के अनुसार ही सुनिश्चित किया जाए।
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, आग लगने के समय किसी मरीज या कर्मचारी को चोट नहीं आई। डीन ने मामले की पूरी जांच के निर्देश देते हुए बताया कि अस्पताल परिसर में सुरक्षा मानकों का उल्लंघन किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस घटना ने प्रशासन और अस्पताल अधिकारियों की सतर्कता की चुनौती सामने ला दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते आग पर नियंत्रण नहीं पाया गया होता, तो यह न केवल संपत्ति के नुकसान बल्कि स्वास्थ्य जोखिम के लिए भी गंभीर साबित हो सकता था।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने कहा कि भविष्य में सभी बायोमेडिकल कचरे का समय पर निपटान और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करने के लिए विशेष निगरानी और नियमित ऑडिट की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
