इंदौर की ऐतिहासिक गेर इस बार भी खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। राजवाड़ा से शुरू होने वाली यह गेर करीब 75 वर्षों से चली आ रही है और अब इसकी पहचान देश विदेश तक पहुंच चुकी है। इस बार करीब पांच लाख लोगों के शामिल होने का अनुमान है जिनमें 100 से अधिक विदेशी पर्यटक भी मौजूद हैं। शहर की सड़कों पर गुलाल मशीनों और पिचकारियों से रंगों की बरसात हो रही है जबकि छतों से फूलों की वर्षा कर पर्यटकों और गेर में शामिल लोगों का स्वागत किया जा रहा है। इंदौर की गेर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की प्रक्रिया भी तेज हो गई है जिससे इस आयोजन की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होने की उम्मीद है।
उधर उज्जैन में रंगपंचमी का पर्व धार्मिक आस्था और वीर परंपरा के साथ मनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने महाकाल मंदिर पहुंचकर भगवान महाकाल के दर्शन किए और विधि विधान से पूजा अर्चना की। इसके बाद उन्होंने पारंपरिक महाकाल गेर में भाग लिया और अखाड़ों की परंपरा के अनुसार शस्त्र पूजन तथा शस्त्र संचालन का प्रदर्शन किया। तलवार सहित पारंपरिक हथियारों के संचालन से उन्होंने अखाड़ा संस्कृति और शौर्य परंपरा को रेखांकित किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि उज्जैन की गेर और अखाड़ों की परंपरा प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है जो वीरता आध्यात्मिकता और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
भोपाल में भी रंगपंचमी को लेकर खास उत्साह देखने को मिल रहा है। शहर के पुराने बाजारों और गलियों से निकलने वाली गेर में बड़ी संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं। रंग गुलाल ढोल ताशों और पारंपरिक संगीत के बीच पूरा शहर रंगों से सराबोर हो गया है। पुराने शहर की हवेलियों और बाजारों के बीच निकलने वाली यह गेर राजधानी की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत करती है।
खंडवा में भी रंगपंचमी के अवसर पर नगर निगम तिराहे से फाग यात्रा निकाली जा रही है जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं। शहर में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए करीब 350 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है।
रंगपंचमी के इन आयोजनों को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। पुलिस द्वारा ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जा रही है वहीं ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए विशेष ट्रैफिक प्लान भी लागू किया गया है। लाखों की भीड़ के बीच स्वास्थ्य और सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
दरअसल रंगपंचमी मालवा की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है जहां रंगों के साथ सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश भी मिलता है। ढोल ताशों की गूंज भजनों की धुन और झांकियों की झलक के बीच यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था को व्यक्त करता है बल्कि प्रदेश के पर्यटन और सांस्कृतिक वैभव को भी नई पहचान देता है।
