परिवाद में कहा गया है कि इस दौरान जीप के बोनट पर तिरंगा ध्वज इस तरह लगाया गया था कि वह झुक गया था और पास खड़े व्यक्ति के पैर से भी स्पर्श हो रहा था।
इस मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश डी.पी. सूत्रकार ने प्रारंभिक साक्ष्यों को देखते हुए मंत्री को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या इस मामले में राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत अपराध दर्ज किया जाना चाहिए। इस कानून के तहत राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को गंभीर अपराध माना गया है, जिसमें दोष सिद्ध होने पर तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जब उन्होंने पंजीकृत डाक के माध्यम से थाना प्रभारी को शिकायत भेजी तो उसे स्वीकार करने से भी इंकार कर दिया गया। उन्होंने अदालत में यह भी तर्क दिया कि यह पुलिस के वैधानिक कर्तव्यों के विपरीत है।
परिवादी ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले Lalita Kumari vs Government of Uttar Pradesh (2014) का हवाला भी दिया। इस फैसले में स्पष्ट कहा गया है कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलती है तो पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य होता है।
अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों में घटना की तस्वीरें, मीडिया रिपोर्ट, डाक ट्रैकिंग रिपोर्ट और विभिन्न अधिकारियों को भेजी गई शिकायतों की प्रतियां भी शामिल हैं। इन सभी दस्तावेजों को देखते हुए विशेष अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को नोटिस जारी किया है।
अब इस मामले में 7 अप्रैल को अदालत में सुनवाई होगी, जहां मंत्री को अपना पक्ष रखना होगा। अदालत के इस कदम के बाद प्रदेश की राजनीति में यह मामला चर्चा का विषय बन गया है।
