श्री मनकामनेश्वर महादेव मंदिर के सामने लगभग 30 से 35 फीट लंबा गड्ढा तैयार किया गया था वैदिक मंत्रोच्चार और पूजन के साथ मंदिर के अखंड दीप से प्रज्वलित अग्नि ने इस गड्ढे को अंगारों में बदल दिया मंदिर के पुजारी ने नंगे पांव इस अग्नि पर चलकर परंपरा का शुभारंभ किया और इसके बाद श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी
श्रद्धालु अपनी मन्नतों के साथ अग्नि पर कदम रखते रहे घी का छिड़काव करने से आग की लपटें और तेज होती रहीं जिससे दृश्य और भी दिव्य हो गया सूरज की तपिश और अंगारों की गर्मी के बावजूद श्रद्धालुओं के चेहरों पर विश्वास की चमक दिखाई दी
ग्रामीणों का कहना है कि बाबा श्री मनकामनेश्वर की कृपा से इस परंपरा में अब तक किसी बड़ी घटना की सूचना नहीं मिली है यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग इसे देखने आए ताकि नई पीढ़ी भी इसे देख सके
इस बार चंद्रग्रहण और सूतक के बीच भी यह परंपरा अपने निर्धारित समय पर संपन्न हुई और इसका श्रेय श्रद्धालुओं की अटूट भक्ति को दिया गया श्रद्धालु अग्नि पार करने के बाद मंदिर में जल अर्पित कर बाबा का आशीर्वाद लेते रहे और पूरा माहौल मेले जैसा बन गया
आयोजन के दौरान प्रशासन और पुलिस बल की मौजूदगी रही, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ और श्रद्धालुओं को कोई असुविधा नहीं हुई धुलेंडी, सूतक और चंद्रग्रहण के विशेष संयोग में यह चूल पार करने की परंपरा केवल रस्म नहीं, बल्कि विश्वास और भक्ति का प्रतीक बन गई
इस अवसर पर हर तरफ “भक्ति और विश्वास” का गूंजता स्वर सुनाई दिया श्रद्धालु और ग्रामीण इस दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठे यह परंपरा उज्जैन के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी
