यह परियोजना लगभग 20 साल पहले शुरू हुई थी, जब अधिकारियों ने तय किया कि सीप नदी के अतिरिक्त पानी को कोलार डैम तक लाया जाएगा। इस योजना का उद्देश्य था, बारिश के मौसम में सीप नदी में बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकना और साथ ही कोलार डैम में 35 अरब लीटर अतिरिक्त पानी जमा करना। इसके लिए एक बड़ी प्रणाली तैयार की गई थी, जिसमें नदी का पानी बांध से रोककर उसे नहरों और भूमिगत सुरंगों के जरिए कोलार जलाशय तक लाया जाता।
परियोजना का काम 2012 में शुरू हुआ था और इसे 2015 तक पूरा होना था। लेकिन अधिकारियों की लगातार लापरवाही और ठेकेदारों की गलती की वजह से इसे कई बार टाला गया। 2020 में, जब परियोजना को किसी तरह पूरा किया गया, तो पहले टेस्टिंग में ही मुख्य नहर टूट गई। इसके बाद सरकार ने दोनों ठेकेदार कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया। नहर की मरम्मत के लिए नया टेंडर जारी किया गया था, लेकिन अब तक इस मरम्मत का काम पूरा नहीं हो पाया है।
सालों से चल रहे इस प्रोजेक्ट की असफलता का सबसे बड़ा कारण यह है कि जनता के टैक्स के पैसे की भारी बर्बादी के बावजूद पानी की एक बूंद भी कोलार डैम तक नहीं पहुंच सका। सीहोर और भोपाल में पेयजल और सिंचाई की समस्याओं को सुलझाने के बजाय, यह परियोजना लोगों के लिए एक बोझ बन गई है। अधिकारियों और ठेकेदारों की खामियों की वजह से न केवल समय की बर्बादी हुई, बल्कि लाखों लोगों की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है।
अब तक इस परियोजना की स्थिति यह है कि 18 महीने में मरम्मत का काम पूरा होना था, लेकिन अब तक इस काम को पूरा करने की कोई निश्चित समयसीमा नहीं है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि सीप-कोलार लिंक परियोजना जनता के पैसे का दुरुपयोग और योजनाओं की विफलता का एक बड़ा उदाहरण बन चुकी है।
