नई दिल्ली । बिहार चुनाव में महागठबंधन में कांग्रेस और राजद ने अपने कोर वोटबैंक को टिकट चयन में तरजीह दी है। इसके साथ ही सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश भी की है। नीतीश के वोट बैंक माने जाने वाले ईबीसी वर्ग को भी महागठबंधन से प्रमुखता से टिकट मिले हैं।
महागठबंधन में आरजेडी और कांग्रेस की रणनीति:
राजद ने अपने वोट बैंक के मुख्य आधार यादव और मुस्लिम समुदायों को महत्व दिया है। 51 सीटों में से 28 यादव और 6 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।
कांग्रेस ने परंपरागत वोटर सवर्ण, दलित और मुस्लिम समुदायों को ध्यान में रखते हुए 50 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए हैं। इसमें 19 सवर्ण (8 भूमिहार, 6 ब्राह्मण, 5 राजपूत), 10 पिछड़ा वर्ग, 6 अति पिछड़ा, 9 दलित, 5 मुस्लिम और 1 अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार शामिल हैं।
वामदलों का फोकस:
वाम दलों ने 29 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं, जिनमें 15 पिछड़ा वर्ग, 8 दलित, 2 अल्पसंख्यक, और कुछ सवर्ण (भूमिहार और राजपूत) शामिल हैं। ये सभी इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रहे हैं।
अति पिछड़ा वर्ग पर विशेष ध्यान:
महागठबंधन अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को साधने में सक्रिय है क्योंकि यह वर्ग करीब 36% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और यह जदयू के नीतीश कुमार के लिए महत्वपूर्ण वोट बैंक है। राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने इस वर्ग के साथ संवाद बढ़ाया है। कांग्रेस, राजद, वाम दल और वीआईपी ने अति पिछड़ा वर्ग को टिकट देकर इसे मजबूत करने की कोशिश की है।
टिकट वितरण में संतुलन:
कांग्रेस ने पिछली बार के मुकाबले सवर्ण उम्मीदवारों की संख्या कम की है, पर पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग को बढ़ावा दिया है।
वाम दल पिछड़ा वर्ग और दलितों को टिकट देकर सामाजिक न्याय के एजेंडे पर फोकस कर रहे हैं।
महागठबंधन की चुनौती:
अभी भी 40% से अधिक सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा बाकी है, इसलिए अंतिम समीकरण में बदलाव संभव है।
एनडीए के मजबूत वोट बैंक के बीच महागठबंधन की यह संतुलित टिकट वितरण उसकी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
इस प्रकार, बिहार चुनाव में महागठबंधन ने जातीय और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए टिकट वितरण किया है, ताकि व्यापक समुदायों का समर्थन हासिल कर सके और चुनावी मुकाबले को और मजबूत बनाए।
