यह मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय के एक फैसले से जुड़ा है, जिसमें उच्च न्यायालय ने एक पुरुष को तलाक की अनुमति दे दी थी। इस फैसले के विरुद्ध महिला ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पाया कि उच्च न्यायालय विवाह को समाप्त करने से पहले कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार करने में असफल रहा था।
न्यायालय द्वारा जांच के महत्वपूर्ण बिंदु
चौदह नवंबर को, न्यायविदों (जस्टिस) सूर्यकांत (जो अब भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं) और जॉयमाला बागची की खंडपीठ (बेंच) ने यह आदेश जारी किया था। खंडपीठ ने कहा कि यह निष्कर्ष निकालने से पहले कि विवाह को अब सुधारा नहीं जा सकता, न्यायालयों को पहले यह जांच करनी चाहिए कि क्या किसी एक पक्ष ने जानबूझकर दूसरे पक्ष को छोड़ा है।
इसके अतिरिक्त, अदालत को यह भी जांच करनी चाहिए कि क्या दोनों पक्ष ऐसी परिस्थितियों के कारण अलग रह रहे हैं जो उनके नियंत्रण में नहीं हैं।
न्यायालय ने यह संकेत दिया है कि जब तक अपनी इच्छा से अलग रहने या साथ रहने से स्पष्ट इनकार का कोई प्रमाण नहीं मिल जाता, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि विवाह पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि यदि इस युगल का कोई बच्चा है, तो यह सवाल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
बच्चों पर प्रभाव और न्यायालय की जिम्मेदारी
‘बार एंड बेंच’ के हवाले से, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में लिखा गया है कि, “यदि जानबूझकर छोड़ने, या साथ रहने से इनकार करने, या साथी की देखभाल करने से मना करने का कोई सबूत नहीं है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है।”
न्यायालय ने आगे कहा, “इसका विशेष रूप से बच्चों पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे नतीजे पर पहुँचने पर, न्यायालय पर यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है कि वह सभी प्रमाणों का अत्यंत सावधानी से विश्लेषण करे, सामाजिक स्थितियों, दोनों पक्षों की पृष्ठभूमि और अन्य सभी संबंधित बातों पर ध्यान दे।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष दो हज़ार दस में शुरू हुआ था, जब पुरुष ने क्रूरता का दावा करते हुए तलाक के लिए पहली अर्जी (याचिका) दायर की थी। हालांकि, बाद में इसे वापस ले लिया गया था।
वर्ष दो हज़ार तेरह में, पुरुष ने दूसरी याचिका दाखिल की, जिसमें उसने दावा किया कि उसकी पत्नी ने उसे छोड़ दिया है।
वर्ष दो हज़ार अठारह में, निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने पुरुष की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पत्नी द्वारा छोड़े जाने का कोई पर्याप्त सबूत नहीं मिला है।
वर्ष दो हज़ार उन्नीस में, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और पुरुष को तलाक की अनुमति दे दी थी।
सर्वोच्च न्यायालय की आपत्ति
सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय ने पति के केवल मौखिक बयानों पर तो ध्यान दिया, लेकिन पत्नी के उन दावों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया कि उन्हें ससुराल से बलपूर्वक बाहर निकाल दिया गया था। इसके साथ ही, पत्नी ने अकेले ही बच्चे का पालन-पोषण किया।
खंडपीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने कई कानूनी प्रश्नों को भी नजरअंदाज कर दिया जो सीधे तौर पर इस मामले से जुड़े थे।
शीर्ष न्यायालय ने इस पूरे मामले को पुनर्विचार के लिए वापस उच्च न्यायालय को भेज दिया है, ताकि सभी पहलुओं की सही तरह से जांच हो सके और न्याय सुनिश्चित किया जा सके। यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि विवाह एक पवित्र संबंध है, और इसे तोड़ने का निर्णय लेने से पहले सभी मानवीय और कानूनी पहलुओं का गहराई से मूल्यांकन किया जाना चाहिए, विशेष रूप से जब बच्चों का भविष्य दांव पर हो।
