नई दिल्ली। प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दौरान हुए विवाद ने अब शंकराचार्य पदवी तक का राजनीतिक-धार्मिक विवाद खड़ा कर दिया है। सोमवार को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पुलिस ने स्नान के लिए पैदल जाने को कहा और उनकी पालकी को रोक दिया। इस दौरान शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की हुई, जिससे मामला बढ़ता गया। नाराज अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए और विवाद का असर माघ मेले की धार्मिक भावना पर भी दिखा।
मंगलवार को मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला देते हुए एक नोटिस जारी किया और पूछा कि उन्होंने खुद को शंकराचार्य कैसे घोषित कर लिया। इस नोटिस के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 24 घंटे में 8 पेज का जवाब ई-मेल के जरिए मेला प्रशासन को भेजा। उन्होंने नोटिस को “मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक” बताया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शंकराचार्य पद पर बने रहने से रोकने का कोई आदेश नहीं दिया है।
उनका कहना है कि मामला कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए प्रशासन का किसी तीसरे पक्ष के तौर पर टिप्पणी करना गलत है। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी कि अगर नोटिस वापस नहीं लिया गया तो वे कोर्ट में मानहानि का दावा करेंगे।
इस विवाद में द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज ने भी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया। उन्होंने प्रशासन की निंदा करते हुए कहा कि “ब्राह्मणों को पुलिस ने चोटी पकड़कर घसीटा, यह शासन का अहंकार है।” सदानंद महाराज ने कहा कि गंगा स्नान रोकने वालों को “गो-हत्या का पाप” लगेगा और प्रशासन को माफी मांगनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि दोनों शंकराचार्य, स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं और उनके निधन के बाद दोनों एक साथ शंकराचार्य बने थे।
विवाद का केंद्र ज्योतिषपीठ में शंकराचार्य पदवी को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और वासुदेवानंद के बीच चल रही कोर्ट में विचाराधीन लड़ाई भी है। इसके चलते प्रशासन ने नोटिस जारी किया, जिसे अब धर्म-राजनीति का बड़ा मुद्दा बनते हुए देखा जा रहा है।
5 पॉइंट में समझिए विवाद:
मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी को रोककर उन्हें पैदल जाने को कहा गया, शिष्यों से धक्का-मुक्की हुई।
अविमुक्तेश्वरानंद ने विरोध में धरना दिया।
मेला प्रशासन ने नोटिस चस्पा कर शंकराचार्य पदवी पर सवाल उठाए।
अविमुक्तेश्वरानंद ने नोटिस को असंवैधानिक बताया और नोटिस वापस न लेने पर मानहानि का दावा करने की चेतावनी दी।
विवाद कोर्ट में विचाराधीन है और राजनीतिक-धार्मिक संगठनों के बयान सामने आ रहे हैं।
इस पूरे मामले में सांसद चंद्रशेखर ने भी प्रशासन पर हमला करते हुए कहा कि चोटी उखाड़ना तानाशाही नहीं तो क्या है? वहीं गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने आरोप लगाया कि धार्मिक छत्र का नेतृत्व सरकार पास रखना चाहती है।
माघ मेले में श्रद्धालुओं का आगमन जारी है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। बाइक पर आने वालों को घाट से 300 मीटर दूर रोका जा रहा है, जबकि कार और अन्य वाहनों को 500 मीटर दूर पार्किंग में खड़ा करने का निर्देश है। कांग्रेस नेता पूनम पंडित ने भी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया और सवाल उठाया कि महाकुंभ में नोटिस क्यों नहीं चिपकाया गया, अब क्यों?यह विवाद अब सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति संघर्ष और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर रहा है।