नई दिल्ली:राज्यसभा में वीआईपी संस्कृति को लेकर एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए Jaya Bachchan ने अपनी तीखी आपत्ति दर्ज कराई उन्होंने कहा कि दिल्ली जैसे महानगरों में वीआईपी मूवमेंट के कारण आम नागरिकों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है और यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है
जया बच्चन ने बताया कि जब भी किसी वीआईपी का आवागमन होता है तो सड़कों को बंद कर दिया जाता है ट्रैफिक को डायवर्ट किया जाता है और आम लोगों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है उन्होंने इस व्यवस्था को जनता के अधिकारों का उल्लंघन बताया
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि हाल ही में संसद के बाहर उन्हें भी वीआईपी मूवमेंट के कारण रोका गया जो उनके लिए बेहद अपमानजनक अनुभव था उन्होंने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें इस तरह की असुविधा का सामना करना पड़ा जो स्वीकार्य नहीं है
उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली में कई इलाकों में जहां बड़े राजनीतिक नेता रहते हैं वहां अक्सर सड़कों को बंद कर दिया जाता है जिससे सांसदों को भी संसद पहुंचने में देरी होती है कई बार उन्हें आधे घंटे तक इंतजार करना पड़ता है और अपनी यात्रा पहले से योजना बनानी पड़ती है ताकि वे समय पर सदन में पहुंच सकें
जया बच्चन ने एक और उदाहरण देते हुए कहा कि एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उन्हें एक घंटे तक ट्रैफिक में फंसे रहना पड़ा जिसका कारण वीआईपी मूवमेंट था उन्होंने कहा कि इस तरह की स्थिति से आम जनता में नाराजगी बढ़ती है और यह असंतोष पैदा करती है
उन्होंने विशेष रूप से चिंता जताई कि वीआईपी संस्कृति के कारण आपातकालीन सेवाएं भी प्रभावित होती हैं कई बार एम्बुलेंस को भी रास्ते में रोक दिया जाता है जो बेहद गंभीर और खतरनाक स्थिति है यदि समय पर इलाज नहीं मिलता तो लोगों की जान तक जा सकती है
अंतरराष्ट्रीय तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कई देशों में वीआईपी मूवमेंट देखा है लेकिन वहां आम लोगों को इस तरह परेशान नहीं किया जाता भारत में यह समस्या अधिक गंभीर है और इसे तत्काल सुधारने की आवश्यकता है
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सभापति से आग्रह किया कि इस मुद्दे को सरकार के सामने उठाया जाए और वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सभी नागरिक समान हैं और किसी को भी विशेषाधिकार के नाम पर दूसरों को परेशान करने का अधिकार नहीं होना चाहिए
जया बच्चन की यह टिप्पणी एक बार फिर इस बहस को सामने लाती है कि क्या वीआईपी संस्कृति आज के लोकतांत्रिक भारत में उचित है या नहीं और क्या इसे बदलने की जरूरत है
