हरीश राणा पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र थे। वर्ष दो हज़ार तेरह (2013) में वे अपने किराए के छात्रावास की चौथी मंज़िल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। इस दुर्घटना के बाद से ही वे लगातार बिस्तर पर हैं और पूरी तरह से कृत्रिम श्वसन यंत्र (वेंटिलेटर) पर आश्रित हैं।
न्यायालय का हस्तक्षेप और निर्देश
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की खंडपीठ (बेंच) ने नोएडा सेक्टर-39 स्थित ज़िला अस्पताल को हरीश राणा के पिता द्वारा दायर याचिका पर दो सप्ताह के भीतर चिकित्सा बोर्ड की जाँच रिपोर्ट अदालत में जमा करने का निर्देश दिया है। पिता ने अपनी याचिका में कहा है कि उनके बेटे की शारीरिक अवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है, और वे अब उसकी पीड़ा को और अधिक नहीं देख सकते।
पीठ ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा: “हम चाहते हैं कि प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड हमें यह रिपोर्ट दे कि क्या जीवन-रक्षक उपचार को रोका जा सकता है। बोर्ड अपनी रिपोर्ट जल्द से जल्द प्रस्तुत करे। रिपोर्ट आने के बाद हम आगे के आदेश पारित करेंगे। यह पूरी प्रक्रिया दो सप्ताह के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।”
दूसरी बार माँगी इच्छा-मृत्यु की अनुमति
यह दूसरी बार है जब हरीश राणा के माता-पिता ने अपने बेटे के लिए ‘निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु’ की अनुमति माँगते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है।
पिछले वर्ष आठ नवंबर, दो हज़ार चौबीस को, सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट पर विचार किया था।
उस रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि उत्तर प्रदेश सरकार की सहायता से मरीज़ को घर पर ही देखभाल (होम केयर) उपलब्ध कराई जाए और चिकित्सक (डॉक्टर) तथा भौतिक चिकित्सक (फ़िज़ियोथेरेपिस्ट) उनकी नियमित जाँच करते रहें।
तब सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि यदि घर पर देखभाल संभव न हो, तो मरीज़ को उचित चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान करने के लिए नोएडा ज़िला अस्पताल में भर्ती किया जाए।
बुधवार को हरीश के पिता की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता (वकील) रश्मि नंदकुमार ने न्यायालय को सूचित किया कि हर संभव प्रयास किए गए हैं, और वे राज्य सरकार द्वारा दी गई सहायता के लिए आभारी भी हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इतने प्रयासों के बावजूद भी हरीश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है।
‘निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु’ की मांग
अधिवक्ता ने न्यायालय को स्पष्ट किया कि वे ‘सक्रिय इच्छा-मृत्यु’ (एक्टिव यूथेनेसिया) की नहीं, बल्कि केवल ‘निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु’ की मांग कर रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के फ़ैसलों के अनुसार, अनावश्यक पीड़ा को समाप्त करने के लिए जीवन-रक्षक उपचार को रोका जा सकता है।
रिपोर्ट को देखने के बाद, न्यायमूर्ति पारदीवाला ने टिप्पणी की कि “लड़के की हालत देखिए, यह बहुत दयनीय (पीड़ादायक) है।”
यह समझना ज़रूरी है कि ‘निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु’ वह चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें मरीज़ के जीवन को बनाए रखने वाली आवश्यक चिकित्सकीय सहायताएँ (जैसे कृत्रिम श्वसन यंत्र आदि) को कानूनी प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे हटा लिया जाता है, जिससे मरीज़ को स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर जाने दिया जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश इस बात पर बल देता है कि ऐसे गंभीर और मानवीय मामलों में कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी चिकित्सीय संभावनाओं और नैतिक पहलुओं की गहन जाँच अत्यंत आवश्यक है। न्यायालय अब बोर्ड की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद ही आगे कोई अंतिम आदेश पारित किया जाएगा।
