उपराष्ट्रपति ने कहा कि हिंदू चेतना केवल रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की एक पद्धति है। उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन और भारत की उस आध्यात्मिक दृष्टि पर बल दिया जो प्रकृति और प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता के दर्शन करती है। उन्होंने वीर-शैव लिंगायत परंपरा के आध्यात्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान को रेखांकित किया और बताया कि मठों और मंदिरों ने सेवा, श्रद्धा और सामाजिक समरसता के मूल्यों को पोषित करने में परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है।
उपराष्ट्रपति ने शिव योगी श्री कदासिद्धेश्वर स्वामीजी की प्रेरणा और आध्यात्मिक दृष्टि की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने समय के साथ ओझल हो चुके इस पवित्र स्थल का पुनरुद्धार किया। उन्होंने अटूट विश्वास के साथ कहा कि सनातन धर्म समय द्वारा परीक्षा ली जा सकती है, लेकिन इसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। उन्होंने श्री कदासिद्धेश्वर मठ के उत्तराधिकारियों के अथक प्रयासों की भी सराहना की, जिन्होंने दैनिक पूजा-अर्चना, अनुष्ठान और जीर्णोद्धार कार्यों को लगातार बनाए रखा।
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रतिपादित “विकास भी, विरासत भी” के विजन को उद्धृत करते हुए कहा कि भारत का विकास और उसकी विरासत साथ-साथ चलने चाहिए। उन्होंने बताया कि आज का भारत तकनीकी रूप से उन्नत, आर्थिक रूप से सुदृढ़ और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ रहा है, जबकि अपनी सभ्यतागत मूल्यों और लोकाचार में उसकी जड़ें उतनी ही गहरी हैं।
राजगोपुरम के उद्घाटन को उपराष्ट्रपति ने आस्था के पुनर्मूल्यांकन और परंपरा की निरंतरता के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा कि पवित्र स्थलों का पुनरुद्धार केवल वास्तुकला का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागरूकता को पुनर्स्थापित करने का माध्यम है।
इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत, कर्नाटक सरकार के भारी एवं मध्यम उद्योग और अवसंरचना मंत्री श्री एम. बी. पाटिल, श्री श्रीशैल जगद्गुरु डॉ. चन्ना सिद्धराम पंडिताराध्य शिवाचार्य स्वामीजी, राज्यसभा सांसद श्री ईरन्ना कडाडी, धर्मगुरु और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी समारोह में शामिल हुए, जिन्होंने उद्घाटन और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर पवित्र स्थल के महत्व को महसूस किया।
उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में भारत की सनातन परंपरा, आध्यात्मिक दृष्टि और सांस्कृतिक समृद्धि का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि पवित्र स्थलों और धार्मिक संस्थाओं का पुनरुद्धार समाज में आत्मविश्वास और चेतना को मजबूत करता है। इस अवसर पर उन्होंने श्रद्धालुओं और पीठाधीश्वरों को अपने अनुभव और मार्गदर्शन साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया। समारोह के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय और उल्लासपूर्ण वातावरण में डूब गया, जिसमें राजगोपुरम का उद्घाटन और महाकुंभाभिषेकम विशेष आकर्षण रहे।
