शिवपुरी– नेपाल से चार्तुमास कर शिवपुरी पधारे आचार्य विजय जी ठाणा पांच जैन साधू, समाधि मंदिर में हुआ मंगल आगमन, सकल जैन समाज ने किया आगमन पर उनका हार्दिक अभिनंदन
शिवपुरी ब्यूरो। धर्म का अर्थ सांसारिक व्याधियों से मुक्ति नहीं है बल्कि धर्म भवसागर से पार उतरने का एक सशक्त माध्यम हैं। अच्छे कर्म और परमात्मा का सुमरण ही हमें आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग बताता हैं। उक्त उदगार नेपाल से चार्तुमास समाप्त कर शिवपुरी पधारे प्रसिद्ध जैन आचार्य विजय हार्दिक रत्न सूरीश्वर जी महाराज ने समाधि मंदिर पर आयोजित एक विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। आचार्य श्री ने बताया कि 30 वर्ष वह जैन श्री संघ के साथ तीर्थ स्थल की पद यात्रा करते हुए शिवपुरी पधारे थे और उस समय की उनकी शिवपुरी के प्रति मधुर याद आज भी ताजा है। वह यहां के श्रीसंघ के अभूतपूर्र्व स्वागत से अभिभूत हैं।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य विजय हार्दिक रत्न सूरिश्वर जी महाराज ने धर्मक्षेत्र में फैली हुई कई भ्रांतियों का खण्डन करते हुए कहा कि धर्मक्षेत्र में अधिकतर लोग संसार पथ में आई बाधाओं का निराकरण करने के लिए आते हैं। यही कारण है कि वह गंगा में स्नान और देवी देवताओं की पूजा कर यह समझते हैं कि उनका सांसारिक जीवन सुखमय रहेगा। मृत्यु के बाद भी वह स्वर्ग की आकांक्षा करते हैं जबकि धर्म का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। मोक्ष प्राप्ति के लिए हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। काम, क्रोध, मोह, मान, माया, राग, द्वेष, कलह, पर परिवाद, हिंसा, झूठ, चोरी, परिग्रह आदि बुरार्ईयों से अपने आपको दूर करना चाहिए। हमेशा प्रभू का स्मरण करना चाहिए। कैसी भी परिस्थिति हो कभी भी अपने परमात्मा को नहीं भूलना चाहिए। परमात्मा का हमारे ऊपर अनंत उपकार है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म भले ही बिना मन से किया जाए उसका फल अवश्य मिलता है। थोड़ा भी धर्म करोगे तो जीवन परिवर्तित होगा और मोक्ष मार्ग की ओर हम अग्रसर होंगे।
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भगवान महावीर को संत सेवा से मिला तीर्थंकर पद
भगवान महावीर के तीर्थंकर बनने के पूर्व के प्रथम भव की चर्चा करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि उस भव में भगवान महावीर नयसार नामक लकड़ हारे थे और जंगल में वह लकड़ी काटने जाते थे। लकड़ी काटते समय भूख लगने पर घर से लाई सूखी रोटी जब वह खाने बैठे तो उनके मन में विचार आया कि किसी संत को रोटी देकर वह खाना खाऐं और उन्होंने वन में ढूंढकर एक संत को भोजन के लिए आमंत्रित किया और उन्हें आहार देकर तीर्थंकर पद को प्राप्त किया। आचार्य श्री ने बताया कि दान की गुणवत्ता और भावना महत्वपूर्ण होती है। संत को खीर का दान देने से ही शाली भद्र को संसार क्षेत्र में उच्चतर स्थान मिला।
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दो हजार वर्ष का जैन इतिहास लिखने वाले संतों की कर्मभूमि है शिवपुरी
आचार्य श्री विजय हार्दिक रत्न सूरिश्वर जी महाराज ने अपने उदबोधन में बताया कि शिवपुरी का नाम यूं ही शिवपुरी नहीं है। शिवपुरी में आचार्य विजयधर्म सूरिश्वर जी जैसे अनेक ऐसे जैन संत पधारे हैं और उन्होंने शिवपुरी को अपनी कर्म भूमि बनाया है जिन्होंने दो हजार वर्षों का जैन इतिहास लिखकर जिन धर्म की शोभा बढ़ाई हैं। उन्होंने बताया कि पूरे भार वर्ष में 18 हजार जैन साधु साध्वियां हैं और सभी शिवपुरी से परिचित हैं। यहां आकर में अपने आपको धन्य मान रहा हूं। आचार्य श्री ठांणा पांच जैन साधु अनिल सांड के निवास स्थान से समाधि मंदिर पहुंचे जहां सकल जैन समाज ने उनका अभिनंदन किया।
