-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दक्षिण एशिया की राजनीति में जल आज प्राकृतिक संसाधन से अधिक रणनीति, संप्रभुता और सुरक्षा का अहम हथियार बन चुका है। चिनाब नदी पर भारत द्वारा उठाया गया ताजा कदम इसी बदले हुए भू-राजनीतिक यथार्थ का सशक्त उदाहरण है। दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के दूसरे चरण को जैसे ही भारत सरकार की पर्यावरणीय समिति से मंजूरी मिली, इस फैसले की गूंज सरहद पार पाकिस्तान तक सुनाई देने लगी। वहां की राजनीति में खलबली मच गई, आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए और एक बार फिर सिंधु जल समझौता चर्चा के केंद्र में आ गया है। भारत के लिए यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हित का सवाल है, जबकि पाकिस्तान इसे अपने अस्तित्व और जल अधिकारों से जोड़कर देख रहा है।
भारत सरकार की पर्यावरण विभाग की विशेषज्ञ समिति ने 27 दिसम्बर को जम्मू-कश्मीर स्थित दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के स्टेज-2 को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की है। वस्तुत: यह मंजूरी मिलते ही पाकिस्तान की सियासत में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की वरिष्ठ सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शेरी रहमान ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत पर “पानी को हथियार बनाने” का संगीन आरोप लगाया। उनके अनुसार, यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भावना के विरुद्ध है।
शेरी रहमान का दावा है कि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुए इस समझौते के तहत पाकिस्तान को चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों के जल पर अधिकार प्राप्त हैं, जबकि भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। रहमान का आरोप है कि भारत ने एकतरफा तरीके से सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया है, जो न तो कानूनी है और न ही नैतिक रूप से स्वीकार्य। पाकिस्तान की आपत्ति केवल दुलहस्ती परियोजना तक सीमित नहीं है। शेरी रहमान ने भारत द्वारा चिनाब घाटी में संचालित या प्रस्तावित कई अन्य परियोजनाओं को भी विवादास्पद करार दिया। उन्होंने सावलकोट, रेटल, बड़सर, पाकल डुल, क्वार, कीरू और किरथाई जैसी परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि भारत सुनियोजित ढंग से इन सभी पर काम तेज कर रहा है। पाकिस्तान का तर्क है कि इन परियोजनाओं के कारण भविष्य में उसके हिस्से के पानी में कटौती हो सकती है, जिससे उसकी कृषि, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
दूसरी ओर भारत का दृष्टिकोण इससे एकदम अलग और स्पष्ट है। भारत बार-बार यह दोहराता रहा है कि सिंधु जल समझौते में उसे पश्चिमी नदियों पर वैध अधिकार प्राप्त हैं। भारत इन नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं स्थापित कर सकता है। दुलहस्ती परियोजना इसी श्रेणी में आती है, जिसका उद्देश्य जल संरक्षण से अधिक स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन है। वहीं इस पूरे घटनाक्रम को हालिया सुरक्षा परिदृश्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
इसी वर्ष 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले ने भारत-पाक संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया। इस हमले में 22 निर्दोष पर्यटकों की धर्म पूछकर हत्या कर दी गई थी। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट में पाकिस्तानी आतंकवादियों की संलिप्तता सामने आने के बाद भारत सरकार ने बेहद सख्त रुख अपनाया। इसके बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का फैसला लिया और पाकिस्तान के साथ जल प्रवाह से जुड़ी तकनीकी जानकारियां साझा करना बंद कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संदर्भ में कई बार दो टूक शब्दों में कह चुके हैं कि “पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।” यह कथन अब केवल राजनीतिक बयान नहीं माना जाना चाहिए, यह तो भारत की नई रणनीतिक सोच का प्रतीक बन चुका है। भारत का मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित आतंकवाद पर ठोस और निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तब तक किसी भी प्रकार के सहयोग या संवाद का आधार नहीं बन सकता।
इसके साथ एक तथ्य यह भी है कि दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के दूसरे चरण के तहत लगभग 260 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन की योजना है। इससे जम्मू-कश्मीर में ऊर्जा उपलब्धता को मजबूती मिलेगी और देश की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। यह परियोजना पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ ही स्थानीय विकास, रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे को भी गति देने वाली है।
इसके साथ ही भारत सरकार चिनाब नदी पर प्रस्तावित सावलकोट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर भी गंभीर तैयारी कर रही है। करीब 1856 मेगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर उत्तरी भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शुमार होगी। भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय क्षेत्र जलविद्युत की अपार संभावनाओं से भरे हुए हैं और इनका उपयोग राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के लिए किया जाना चाहिए।
अंततः चिनाब नदी पर भारत का यह कदम कहना होगा कि तकनीकी या ऊर्जा परियोजना भर नहीं है, यह तो बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का संकेतक है। पाकिस्तान की बौखलाहट और आरोपों के बावजूद भारत यह संदेश देने में सफल रहा है कि अब राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और संप्रभु अधिकारों पर कोई समझौता नहीं होगा। फिलहाल मोदी सरकार अपने कहे पर अडिगता से खड़ी हुई नजर आ रही है। निश्चत ही इस निर्णय से प्रत्येक भारतवासी अपनी सरकार पर गौरव महसूस कर सकता है।
