सैन्य सुविधाओं के सीमित इस्तेमाल की अनुमति
इस समझौते के तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं जैसे नौसैनिक बेस, एयरफील्ड और मिलिट्री बेस का सीमित उपयोग कर सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस और जरूरी साजो-सामान की आपूर्ति जैसी लॉजिस्टिक सेवाएं शामिल हैं। हालांकि समझौते में यह स्पष्ट किया गया है कि हर मामले में संबंधित देश से पहले अनुमति लेना जरूरी होगा। यानी यह पूरी तरह संबंधित सरकार के निर्णय पर निर्भर करता है कि वह किस स्थिति में अनुमति देती है और किस मामले में नहीं।
क्या है LEMOA समझौता
भारत और अमेरिका के बीच Logistics Exchange Memorandum of Agreement यानी LEMOA पर 29 अगस्त 2016 को हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में हुआ था। इसका उद्देश्य दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट, सप्लाई और सेवाओं के आदान-प्रदान के लिए नियम और शर्तें तय करना है। माना जाता है कि यह अमेरिका के लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (LSA) का भारतीय संस्करण है, जैसा कि अमेरिका ने कई अन्य देशों के साथ भी किया हुआ है।
किन गतिविधियों को कवर करता है समझौता
यह समझौता मुख्य रूप से चार प्रमुख क्षेत्रों को कवर करता है, जिनमें बंदरगाहों पर जहाजों का रुकना यानी पोर्ट कॉल्स, संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण गतिविधियां तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) शामिल हैं। इसके अलावा किसी अन्य जरूरत के लिए दोनों देशों के बीच अलग से आपसी सहमति जरूरी होती है। समझौते के तहत दी जाने वाली सेवाओं के बदले संबंधित देश को या तो नकद भुगतान करना होता है या फिर समान लॉजिस्टिक सेवाएं उपलब्ध करानी होती हैं।
लॉजिस्टिक सपोर्ट में क्या-क्या शामिल
LEMOA के तहत मिलने वाली लॉजिस्टिक सेवाओं में भोजन, पानी, रहने की व्यवस्था, परिवहन, पेट्रोलियम, तेल और लुब्रिकेंट्स, कपड़े, संचार सेवाएं, चिकित्सा सुविधाएं, स्टोरेज, प्रशिक्षण सेवाएं, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और रखरखाव, कैलिब्रेशन सेवाएं और पोर्ट सेवाएं शामिल हैं। खास बात यह है कि यह समझौता किसी भी देश को संयुक्त सैन्य गतिविधि करने के लिए बाध्य नहीं करता। साथ ही इसमें किसी भी प्रकार का सैन्य बेस स्थापित करने या स्थायी बेसिंग की व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है। इसे पूरी तरह से लॉजिस्टिक सहयोग का समझौता माना जाता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह घटना
IRIS डेना पोत के डूबने की घटना भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जिस क्षेत्र में यह घटना हुई वह भारत के समुद्री पड़ोस में आता है। हिंद महासागर में श्रीलंका के दक्षिण का इलाका वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख समुद्री मार्गों में गिना जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य टकराव समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
भारत में नौसैनिक अभ्यास में शामिल हुआ था पोत
बताया जा रहा है कि IRIS डेना युद्धपोत भारत में आयोजित ‘मिलन’ नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने आया था। यह अभ्यास 18 से 25 फरवरी के बीच आयोजित हुआ था, जिसमें दुनिया के कई देशों की नौसेनाओं ने भाग लिया। इस दौरान 80 से अधिक युद्धपोत समुद्र में एक साथ दिखाई दिए थे। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समुद्री सहयोग और नौसैनिक कूटनीति को मजबूत करना था। नौसैनिक परेड की समीक्षा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की थी।
हमले को लेकर भारत की क्या है नीति
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डेना पोत भारत के निमंत्रण पर अभ्यास में शामिल होने जरूर आया था, लेकिन घटना के समय वह भारत की समुद्री सीमा से बाहर जा चुका था। ऐसे में इस घटना के लिए सीधे तौर पर भारत की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत अपनी स्पष्ट नीति पर कायम है कि वह किसी भी देश को हमले के लिए अपने सैन्य बेस का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा। हालांकि इस पूरे मामले को लेकर यह भी देखा जाएगा कि ईरान इसे किस नजर से देखता है।
