उमरिया– उमरिया जिले के मानपुर तहसील अंतर्गत सहकारी समिति कोटरी में गेहूं खरीदी के दौरान किसानों की पीड़ा और शोषण की तस्वीरें सामने आ रही हैं। प्रदेश सरकार जहां “किसान कल्याण वर्ष” मनाने और किसानों को राहत देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं धरातल पर किसान खुद को ठगा और अपमानित महसूस कर रहा है।
खरीदी केंद्र में किसानों से निर्धारित सीमा से अधिक गेहूं भरवाया जा रहा है। किसानों का आरोप है कि 50 किलो की बोरी के स्थान पर 51 से लेकर 51.500 किलोग्राम तक गेहूं जबरन तौला जा रहा है। विरोध करने पर खरीदी रोकने और परेशान करने की धमकी दी जाती है। मजबूर किसान अपनी उपज बेचने के लिए चुपचाप शोषण सहने को विवश हैं।
“हम खुद मजदूर बन गए” — किसानों का दर्द
किसानों ने बताया कि खरीदी केंद्र में समिति की ओर से किए जाने वाले अधिकांश कार्य भी उनसे ही करवाए जा रहे हैं। किसान स्वयं बोरी में गेहूं भरते हैं, स्ट्रेंसिल लगाते हैं, तुलाई करवाते हैं और सिलाई तक कराते हैं। इसके बाद ही पावती रसीद दी जाती है।
किसानों का कहना है कि यदि “सेटिंग” नहीं हो तो गेहूं पास नहीं किया जाता। कई किसानों ने आरोप लगाया कि केंद्र में नियुक्त सर्वेयर भी प्रबंधक का करीबी व्यक्ति है और बिना पैसे दिए काम आगे नहीं बढ़ता। गरीब किसान अपनी फसल बेचने के लिए अपमान और आर्थिक बोझ दोनों झेल रहा है।
शिकायत से पहले पहुंच जाती है सूचना-
ग्रामीणों का आरोप है कि जब भी कोई किसान शिकायत करता है, तो जांच से पहले ही खरीदी केंद्र को सूचना पहुंच जाती है। इसके बाद सब कुछ “मैनेज” कर लिया जाता है। किसानों का कहना है कि अधिकारी पहुंचते हैं तो कुछ चुनिंदा लोगों को सामने खड़ा कर दिया जाता है, जो सब कुछ सामान्य बताते हैं।
किसानों का दर्द है कि शिकायत करने के लिए उन्हें गांव से जिला मुख्यालय तक किराया खर्च कर जाना पड़ता है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलता है। इससे किसानों का प्रशासन पर भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है।
करोड़ों के घोटाले के आरोप, फिर भी कार्रवाई नहीं-
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि समिति में पहले भी करोड़ों रुपये की अनियमितताओं की जांच हुई थी, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। आरोप है कि रिकॉर्ड उपलब्ध न कराने के बावजूद संबंधित जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि खरीदी केंद्रों की निष्पक्ष और आकस्मिक जांच हो जाए तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं। किसानों ने यह भी मांग की है कि खाद्य और सहकारिता विभाग से अलग स्वतंत्र टीम द्वारा जांच करवाई जाए।
किसान कल्याण वर्ष पर उठ रहे सवाल-
प्रदेश सरकार किसानों के हित में योजनाएं और घोषणाएं कर रही है, लेकिन उमरिया जिले के इन हालातों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। किसान पूछ रहे हैं कि यदि खरीदी केंद्रों पर ही उनका शोषण होगा, तो “किसान कल्याण वर्ष” का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
खेत में दिन-रात मेहनत करने वाला अन्नदाता आज अपनी ही उपज बेचने के लिए अधिकारियों, कर्मचारियों और व्यवस्था के सामने बेबस नजर आ रहा है। किसानों की मांग है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और खरीदी व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए, ताकि अन्नदाता को सम्मान और न्याय मिल सके।
