करैरा/शिवपुरी। किसी ने सही कहा है—नियम, कानून और आदेश अक्सर आम लोगों के लिए सख्ती से लागू होते हैं, लेकिन जब बात प्रभावशाली व्यवस्थाओं या प्रशासनिक ढिलाई की आती है तो वही नियम कागजों तक सीमित नजर आते हैं। करैरा में सामने आई स्थिति कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रही है।
एक तरफ जिला मुख्यालय पर कलेक्टर अर्पित वर्मा बैठक लेकर अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के आसपास नशीले पदार्थों की बिक्री नहीं होनी चाहिए, युवाओं को नशे से बचाया जाए, जागरूकता अभियान चलें और निगरानी बढ़े। दूसरी ओर करैरा के राष्ट्रीय राजमार्ग-27, टीला रोड क्षेत्र में संचालित देशी-विदेशी कंपोजिट शराब दुकान को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।
विवाद केवल शराब दुकान खुलने का नहीं, बल्कि उसके स्थान को लेकर है। स्थानीय दावों के अनुसार यह दुकान शासकीय महाविद्यालय और आवासीय बालिका हरिजन कल्याण छात्रावास के बेहद नजदीक संचालित हो रही है। यदि ऐसा है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि छात्राओं और युवाओं के बीच शराब बिक्री की मौजूदगी किस तर्क पर उचित मानी जा रही है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि संबंधित शराब दुकान राष्ट्रीय राजमार्ग के बेहद करीब संचालित है। इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि दुकान से कम दूरी पर बालिका छात्रावास और स्नातक महाविद्यालय स्थित हैं। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आबकारी विभाग ने स्थल निरीक्षण किया था? क्या दूरी संबंधी मानकों और सुरक्षा पहलुओं की जांच हुई? यदि हुई, तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
और सबसे अहम सवाल—जब प्रशासन स्वयं स्कूलों के आसपास नशे के खिलाफ अभियान की बात कर रहा है, तब करैरा जैसी जगहों पर ऐसी स्थितियां क्यों दिखाई दे रही हैं? क्या नशा विरोधी बैठकें केवल प्रेस नोट तक सीमित हैं?
स्थानीय लोगों की चिंता यह भी है कि शराब दुकान के कारण छात्रावास और शिक्षण संस्थानों के आसपास असामाजिक गतिविधियों का खतरा बढ़ सकता है। यदि युवाओं को नशे से दूर रखने की नीति है, तो शिक्षण परिसरों के आसपास शराब की उपलब्धता उस नीति के विपरीत प्रतीत होती है।
नशे के खिलाफ लड़ाई भाषणों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई से तय होगी। और यदि नियमों की कसौटी पर आम नागरिकों को परखा जाता है, तो वही कसौटी प्रशासनिक निर्णयों पर भी लागू होनी चाहिए।
