निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार पुणे जिले के बारामती और अहिल्यानगर के राहुरी विधानसभा क्षेत्रों में 23 अप्रैल को उपचुनाव होने हैं। बारामती सीट पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के कारण खाली हुई है जबकि राहुरी सीट भाजपा विधायक शिवाजी कर्डिले के निधन के चलते रिक्त हुई। बारामती से सुनेत्रा पवार के चुनाव लड़ने की पूरी संभावना जताई जा रही है जिससे यह सीट पहले से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनी हुई थी लेकिन अब मुकाबला एकतरफा होने की संभावना बढ़ गई है।
दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान सुले ने साफ शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी बारामती उपचुनाव नहीं लड़ेगी और वह अपनी वहिनी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारेंगी। इस बयान के साथ उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राजनीति से ऊपर परिवार को रखा जाना चाहिए। हालांकि राहुरी सीट को लेकर महा विकास आघाडी के सहयोगी दलों के बीच अभी चर्चा जारी है और जल्द ही इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।
इस बीच महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कहा है कि बारामती और राहुरी उपचुनाव को निर्विरोध कराने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि चुनावी मुकाबला होता है तो भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह तैयार है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक स्तर पर सहमति बनाने की कोशिशें जारी हैं लेकिन स्थिति पूरी तरह एकमत नहीं है।
गौरतलब है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सुप्रिया सुले ने बारामती सीट पर सुनेत्रा पवार को हराकर अपनी पकड़ बरकरार रखी थी। उस समय सुनेत्रा पवार पहली बार चुनाव मैदान में उतरी थीं। बाद में उन्हें राज्यसभा भेजा गया। इसी वर्ष 28 जनवरी को बारामती के पास एक विमान दुर्घटना में अजित पवार और अन्य लोगों की मौत के बाद राजनीतिक हालात तेजी से बदले और सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ पार्टी की कमान भी सौंपी गई।
सुले ने इस दौरान अजित पवार की मौत से जुड़े विमान हादसे की पारदर्शी जांच की मांग भी दोहराई है। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच एलपीजी संकट पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की। उनका कहना है कि इस मुद्दे पर संसद में चर्चा होनी चाहिए और सरकार को इसे नजरअंदाज करने के बजाय ठोस कार्ययोजना बनानी चाहिए क्योंकि इसका असर आम जनता से लेकर उद्योग जगत तक पर पड़ रहा है। कुल मिलाकर बारामती उपचुनाव में सुप्रिया सुले का यह फैसला न सिर्फ राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है बल्कि यह भी दिखाता है कि भारतीय राजनीति में कभी-कभी रिश्ते भी चुनावी गणित पर भारी पड़ जाते हैं।
